
सुप्रीमकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद भी अवैध निर्माणों के लिए जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर केवल लीपोपाती
मेरठ। शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट समेत तमाम आवासीय योजना में आवासीय भवनों व भूखंडों पर कामर्शियल अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार आवास विकास के अफसरों को बचाने के लिए आवास विकास और सिस्टम के दूसरे अफसरों व पुलिस ने फुल प्रुफ प्लान उनके खिलाफ मुकदमों से पहले ही तैयार कर लिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि अवैध निर्माणों के लिए जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ मुकदमा ऐसी धाराओं में लिखा गया जिसमें बाहर से बाहर जमानत मिल गयी। इन तमाम अफसरों को एक घंटे के लिए भी सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया। इसके इतर आवंटियों के दुकानों और मकानों को ध्वस्त करने में अफसरों ने कोई गुरेज नहीं की। यहां केवल गुनाहगार और फसाद की जड़ अफसरों को ही आवास विकास नहीं बचा रहा है बल्कि ध्वस्तीकरण के नाम पर भी पिंक एडं चूज की स्थिति है। जैना ज्वैलर्स सरीखे बड़ी मछलियों पर हाथ डालने में आवास विकास अफसरों के पांव कांप रहे हैं।
इन अफसरों पर दर्ज है मुकदमा
सेंट्रल मार्केट समेत आवास विकास की तमाम योजनाओं में अवैध निर्माणों के लिए जिम्मेदार जिन अफसरों पर 16/17 अक्टूबर 2025 को थाना नौचंदी में मुकदमा लिखा गया है। उनमें शिकायतकर्ता आवास विकास परिषद के अधिशासी अभियंता आफताब अहमद की तहरीर पर आवास विकास परिषद में 1990 से अलग-अलग समय पर मेरठ में तैनात रहे 45 अधिकारी शामिल हैं। इनके खिलाफ
अपने पद/कर्तव्य का सही निर्वहन न करने और रिकॉर्ड/कानूनी प्रक्रिया से संबंधित लापरवाही के आरोप में मुकदमा लिखा गया है। जांच कमेटी ने कुल 49 अधिकारियों की भूमिका/लापरवाही चिन्हित की थी, लेकिन इनमें से 4 की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए 45 के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। इनमें अधीक्षण अभियंता नरसिंह प्रसाद, सीके जैन, अरविंद कुमार, राम सहाय सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, अधीशासी अभियंता एसपीएन सिंह, एके जैन, आरके गुप्ता, आरए वर्मा, भोला नाथ, सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता जीएस पालीवाल, एके बंसल, हरिन्द्र सिंह नरेश, सेवानिवृत्त अधिशासी अभियंता जमुना प्रसाद, चंद्रभान कश्यप, मनोहर कुमार, अवर अभियंता रविन्द्र सिंह, संजीव शुक्ला, सुखबीर सिंह, जगदीश कुमार अरोरा, रतनवीर सिंह, ओम प्रकाश िसंह, रामकिशन वर्मा, रियाजुद्दीन, जीत सिंह, चंद्रपाल, सहायक अभियंता उमेश मोहन शर्मा, पिंकू गौतम, डीके गोयल, शशि भूषण, एनके शर्मा, रविकांत, आरके सक्सेना, संगणक अवर अभियंता वीरेन्द्र कुमार, सहायक अभियंता सोहन पाल सिंह, शांति प्रसाद, आरपी सिंह, देवराज वर्मा, सुरेंद्र कुमार बडेरा, श्रीधर भांडेगावकर, सेवानिवृत्त अवर अभियंता बसंत लाल मैनी, एके भटनागर समेत कुल 45 अधिकारी शामिल हैं। भी शामिल हैं।
एफआईआर पर ही सवाल
अप्रैल 2026 की रिपोर्टों में बताया गया कि FIR के लगभग छह महीने बाद भी इन अधिकारियों की गिरफ्तारी नहीं हुई थी और पुलिस द्वारा उनके ठिकानों/पते की तलाश को लेकर भी सवाल उठे थे। सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं कि जो तहरीर दी गयी उसमें आरोपी अधिकारियों के नाम दिए गए पते नहीं दिए गए। पुलिस ने भी इनका नाम पता करने की जहमत नहीं उठायी।
बढ़ता गया ध्वस्तीकरण का दायरा
शुरूआत में यह मामला सेंट्रल मार्केट स्थित भवन संख्या 661/6 से जुड़ा था। इस संपत्ति का आवंटन आवासीय उपयोग के लिए हुआ था, लेकिन बाद में यहां व्यावसायिक निर्माण का मामला सामने आया।हाई कोर्ट के पुराने आदेश के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अलग-अलग चरणों में अदालत ने आवासीय संपत्तियों में नियमों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के निर्देश दिए। इसका दायरा बढ़ने के साथ ही तमाम योजनाएं इसमें शामिल कर ली गयीं। दो दिन पहले की कार्रवाई का तत्काल फोकस 44 चिन्हित और सील संपत्तियों में से आदेश का पालन नहीं करने वाले निर्माण हैं। व्यापक मामले में सैकड़ों आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल और सेटबैक से जुड़े सवाल अलग से अदालत और प्रशासन के सामने रहे हैं। हाल की रिपोर्ट में 859 भवनों में से लगभग 350 में सेटबैक खाली किए जाने की प्रक्रिया होने की बात सामने आई थी। जो कार्रवाई बीते बुधवार को की गयी 21 सितंबर को होने वाली सुप्रीमकोर्ट की सुनवाई में रखने वाली रिपोर्ट अफसरों ने उसकी के आधार पर तैयार की है।


