यूपी समेत कई राज्यों के विधानसभा चुनाव और उसके बाद साल 2029 में लोकसभा के चुनाव को ध्यान में रखते हुए यह वापसी मानी जा रही है
नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संगठन में लगभग छह साल बाद राम माधव की वापसी हुई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष की नई टीम में उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। राम माधवा को एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी संगठन में वापस बलाया गया है। राम राधव रिटर्न के पीछे भाजपा व संघ के बीच समन्वय कायम करने का प्रयास है। राम माधव मूल रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ प्रचारक और पूर्व प्रवक्ता रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद संघ और भाजपा के बीच आपसी रिश्तों को और मजबूत करने तथा दोनों संगठनों के बीच एक मजबूत वैचारिक कड़ी स्थापित करने के लिए संघ की सिफारिश और शीर्ष नेतृत्व की सहमति पर उनकी वापसी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुरुआती वैश्विक दौरों और विदेशों में भारतीय प्रवासियों (Indian Diaspora) के बड़े कार्यक्रमों (जैसे अमेरिका में मैडिसन स्क्वायर कार्यक्रम) के प्रबंधन में राम माधव ने मुख्य भूमिका निभाई थी। पार्टी उनके इस वैश्विक संपर्क और बौद्धिक क्षमता का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहती है।
संगठन का अनुभव
राम माधव को भाजपा का एक कुशल रणनीतिकार माना जाता है। उन्हें पूर्व में अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए महासचिव के रूप में बड़े राज्यों और कठिन क्षेत्रों में पार्टी का आधार बढ़ाने का गहरा सांगठनिक अनुभव है। हालांकि जहां तक अनुभव की बात है तो राम माधव की मौजूदगी के बावजूद कश्मीर में 2018 में भाजपा और पीडीपी का वह प्रयोग वैचारिक मतभेदों के कारण अंततः टूट गया था, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक एक दीर्घकालिक राजनीतिक क्षति मानते हैं।
कश्मीर में रणनीति हो गयी थी विफल
अनुच्छेद 370 हटने के बाद हुए 2024 के चुनावों में भाजपा जम्मू क्षेत्र में तो मजबूत रही, लेकिन राम माधव के तमाम प्रयासों के बावजूद पार्टी कश्मीर घाटी में उम्मीद के मुताबिक सीटें नहीं जीत सकी और नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन ने बहुमत हासिल किया। वर्ष 2014-15 में जब भाजपा ने महबूबा मुफ्ती की पीडीपी (PDP) के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर में पहली बार गठबंधन सरकार बनाई थी, तब राम माधव इसके मुख्य सूत्रधार थे। असम, नागालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों में पार्टी की जीत और सरकार गठन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन 2018 में भाजपा और पीडीपी का वह प्रयोग वैचारिक मतभेदों के कारण अंततः टूट गया था, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक एक दीर्घकालिक राजनीतिक क्षति मानते हैं।


