पैसे वालों का क्या असली मुसीबत तो मुफलिसों की है

Shekhar Sharma
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आने वाले महीनों में दुनिया के सामने एक गंभीर खाद्य संकट (Food Crisis) आने की आशंका

नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम के दौरान आने वाले महीनों में दुनिया के सामने एक गंभीर खाद्य संकट (Food Crisis) आने की आशंका जताई है। उन्होंने चेतावनी दी है कि वैश्विक संघर्षों और मौसम के मिजाज के कारण विशेष रूप से ग्लोबल साउथ (विकासशील और गरीब देशों) की अर्थव्यवस्थाओं पर बहुत बड़ा दबाव आने वाला है। यदि यह आशंका वाकई सही है तो भारत जैसे देशों में जहां बिना राशन कार्ड, बिना आधार कार्ड और बिना किसी महानगरीय सुविधा के दूरदराज के गांव में रहने वाले ऐसे गरीब की क्या मौत निश्चित है? अगर स्थानीय समाज और उसके आस-पास के लोग पूरी तरह संवेदनहीन हो जाएं, तो उस गरीब की मौत निश्चित है। यदि पूरा गांव मुंह फेर ले और सिस्टम चलाने वाले महज अपनी फाइलों में व्यस्त रहे, तो वह व्यक्ति चुपचाप दम तोड़ देता है। वहीं दूसरी ओर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस पूरे मसले को ‘4F संकट’ (4F Crisis) के रूप में समझाया है, जिसमें फूड (अनाज), फ्यूल (ईंधन), फर्टिलाइजर (उर्वरक) और फाइनेंस (वित्त) शामिल हैं। यह चारों मोर्चे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन्हीं के कारण खाद्य संकट गहरा रहा है।

जंग के साइड इफैक्ट

यूक्रेन युद्ध और ईरान-खाड़ी (West Asia) संघर्ष के चलते समुद्र के रास्ते होने वाला व्यापार ठप हो रहा है। विशेष रूप से काला सागर (Black Sea) मार्ग प्रभावित होने से दुनिया के बड़े अनाज निर्यातक देश अपनी खेप बाहर भेजने की स्थिति में नहीं हैं। रूस और मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) दुनिया के प्रमुख खाद उत्पादक क्षेत्र हैं। इन युद्धों के कारण दुनिया भर में खाद की भारी किल्लत हो गई है। अगर किसानों को सही समय पर खाद नहीं मिलेगी, तो अगली फसल की पैदावार अपने आप गिर जाएगी। तेल की आपूर्ति में बाधा आने और इस पर हो रही वैश्विक राजनीति के कारण ईंधन (फ्यूल) के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं।

गरीबों की मुसीबत

जो कुछ सुनने में आ रहा है उसके चलते मुसीबत गरीबों की है। इसका सबसे गहरा और सीधा असर समाज के सबसे कमजोर तबके पर पड़ता है, विशेष रूप से उन बेघर और निर्धन लोगों पर जो खुले आसमान के नीचे रहते हैं। खुले आसमान के नीचे रहने वाले अधिकांश लोग दैनिक मजदूर, कचरा बीनने वाले या रिक्शा चालक होते हैं। उनकी आय का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ भोजन पर खर्च होता है। जब अनाज, दालें और तेल महंगे होते हैं, तो उनके पास अन्य जरूरी चीजों (जैसे दवा या बीमारी से बचाव) के लिए पैसे नहीं बचते। पेट भरने के लिए वे अक्सर कम पौष्टिक या बासी भोजन करने पर मजबूर हो जाते हैं। बिना राशन कार्ड, बिना आधार कार्ड और बिना किसी महानगरीय सुविधा के दूरदराज के गांव में रहने वाले ऐसे गरीब की क्या मौत निश्चित है? अगर स्थानीय समाज और उसके आस-पास के लोग पूरी तरह संवेदनहीन हो जाएं, तो उस गरीब की मौत निश्चित है। ऐसे मामले में कोई भी सरकारी गारंटी या कागजी ढांचा उस आखिरी गरीब को तुरंत सुरक्षा देने में पूरी तरह नाकाम है।

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