कुमार विश्वास को रास नहीं आ रही रास की राजनीति

Shekhar Sharma
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इससे पहले 2018 (AAP के समय), 2024 और अब 2026 में भी वे ‘एमपी-इन-वेटिंग’ की फेहरिस्त में ही सिमटा दिए गए

नई दिल्ली। राज्यसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से भाजपा की ओर से मशहूर कवि कुमार विश्वास को उम्मीदवार बनाए जाने की अटकलें मीडिया और राजनीतिक गलियारों में बेहद तेज थीं। कुमार विश्वास ब्राह्मण समुदाय से आते हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। यूपी भाजपा द्वारा केंद्रीय नेतृत्व को भेजे गए संभावित नामों के पैनल में उनका नाम शामिल होने की खबरें भी आई थीं। हालांकि, 5 अक्टूबर 2026 को घोषित भाजपा की आधिकारिक सूची में उनका नाम शामिल नहीं था। राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें टिकट न मिलने (या ड्रॉप किए जाने) के पीछे सिर्फ पुराने कवि सम्मेलनों में की गई टिप्पणियां ही एकमात्र वजह नहीं हैं, बल्कि भाजपा की अपनी रणनीतिक और संगठनात्मक प्राथमिकताएं प्रमुख रही हैं।

भाजपा के पैमाने पर नहीं उतरे खरे

पार्टी के कुछ गलियारों में यह माना जाता है कि कुमार विश्वास अतीत में मंचों से राजनीतिक दलों पर तीखे तंज कसने के लिए जाने जाते रहे हैं। हालांकि, राजनीति में तात्कालिक समीकरण और उपयोगिता ज्यादा मायने रखती है। चूंकि हाल के वर्षों में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की खुलकर सराहना की है और सनातन धर्म से जुड़े विषयों पर वे मुखर रहे हैं, इसलिए पुरानी टिप्पणियों से ज्यादा भाजपा की सांगठनिक प्राथमिकताएं, उम्मीदवारों की भारी भीड़ (जैसे स्मृति ईरानी, संजीव बालियान का पैनल में होना) और जातिगत संतुलन उनके ड्रॉप होने की असली वजह बने।

पहली बार नहीं

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब कुमार विश्वास का नाम राज्यसभा के लिए चर्चा में आकर रह गया हो, इससे पहले 2018 (AAP के समय), 2024 और अब 2026 में भी वे ‘एमपी-इन-वेटिंग’ की फेहरिस्त में ही सिमट कर रह गए। कुमार विश्वास पहले आम आदमी पार्टी (AAP) के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे हैं और लंबे समय तक धुर-विरोधी राजनीति का हिस्सा थे। यद्यपि आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल से अलग होने के बाद उनका भाजपा के प्रति झुकाव बढ़ा है, लेकिन किसी भी बाहरी या सेलिब्रिटी चेहरे को सीधे संसद के उच्च सदन में भेजने से पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा होने का जोखिम रहता है। इसके अलावा भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अमूमन ऐसे नेताओं को राज्यसभा भेजना पसंद करता है जो लंबे समय से संगठन में सक्रिय रहे हों, जिन्होंने जमीनी स्तर पर पार्टी के लिए काम किया हो या जो संगठन के पूर्णकालिक अंग बन चुके हों। कुमार विश्वास भले ही पिछले कुछ समय से अपने धार्मिक प्रवचनों (जैसे ‘अपने-अपने राम’) और बयानों के जरिए भाजपा की विचारधारा (कोर पॉलिटिक्स) के करीब दिखे हैं, लेकिन वे भाजपा के औपचारिक सदस्य या जमीनी कैडर का हिस्सा नहीं रहे हैं। पार्टी ने अपने मूल और समर्पित कार्यकर्ताओं को तरजीह देना बेहतर समझा।

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