चीन से टकराव की स्थिति में भारत को रूस से नहीं मिल पाएगा एकतरफा खुला सपोर्ट
नई दिल्ली। रूस-चीन की निकटता से मध्य एशिया और यूरेशिया में भारत का प्रभाव कम हो सकता है। भारत इस क्षेत्र में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए रूस, ईरान और मध्य एशियाई देशों के साथ ‘अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा’ (INSTC) जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। इसके अलावा अमेरिका और रूस दोनों का एक साथ चीन के करीब जाना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के लिए एक गंभीर कूटनीतिक और सामरिक चुनौती (Strategic Threat) का खतरा पैदा करता है। यदि वाशिंगटन और मॉस्को दोनों ही बीजिंग के साथ अपने समीकरणों को प्राथमिकता देने लगते हैं, तो भारत के लिए महाशक्तियों के बीच संतुलन के विकल्प सिमट जाएंगे। जिसको सही नहीं कहा जा सकता।
तो भारत का समर्थन नहीं करेगा रूस
यदि भारत और चीन के बीच 1962 की तर्ज पर जंग होती है तो फिर रूस से भारत खुला समर्थन हासिल नहीं कर सकेगा। इस मामले में अमेरिका का भी ट्रेक रिकार्ड भारत के मामले में बेहद खराब है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान काफी चीजें अमेरिका के स्तर से मुनाफिक नहीं रहीं। यदि भविष्य में भारत-चीन के बीच सैन्य टकराव होता है, तो चीन पर अत्यधिक निर्भर रूस मध्यस्थ या तटस्थ रहने की घोषणा कर सकता है, जिससे भारत एक महत्वपूर्ण महाशक्ति का खुला समर्थन खो देगा। भारत आज भी अपने 60% से अधिक सैन्य साजो-सामान और उन्नत तकनीक (जैसे S-400, सुखोई पुर्जे) के लिए रूस पर निर्भर है। रूस के रक्षा उद्योग पर चीनी प्रभाव बढ़ने से भारत की सैन्य तैयारियों की गोपनीयता और आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
भारत के खिलाफ चक्रव्यूह
अमेरिका और रूस का चीन के करीब आना भारत के लिए किसी चक्रव्यूह सरीखा है और यह स्थिति भारत के लिए निश्चित रूप से एक अलार्म बेल है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था इतनी जटिल है कि न तो अमेरिका पूरी तरह चीन पर भरोसा कर सकता है और न ही रूस भारत जैसे विशाल बाजार और मित्र को पूरी तरह छोड़ना चाहेगा। भारत के लिए परीक्षा इस बात की है कि इस त्रिकोणीय चक्रव्यूह से कैसे निकलता है या फंस जाएगा।
चीन का वर्चस्व
रूस और अमेरिका दोनों द्वारा चीन को केंद्रीय धुरी मान लेने से पूरे एशिया में बीजिंग का दबदबा स्थापित होने का खतरा बढ़ जाता है। जो हालात आज नजर आ रहे हैं, उससे इस पूरे खित्ते में चीन का वर्चस्व साफ नजर आ रहा है। भारत के लिए यह ना तो अच्छा है और ना ही भारत को चीनी वर्चस्व को बढ़ते हुए चुपचाय देखना है। यदि चीनी वर्चस्व बढ़ता है तो अमेरिका रूस के अलावा दूसरे यूरोपियन देशों में चीन के लिए बाजार के नए रास्ते खुलेंगे। बाजार खुलेगा तो चीन एक संपन्न आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। भले ही चीन से लड़ाई ना हो लेकिन आर्थिक लड़ाई में फिर भारत और चीन के बीच कोई मुकाबला नहीं रह जाएगा।


