राहत की दरकार नजर आते हैं बेजार

Shekhar Sharma
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लड़ाई से उठता नजर आ रहा है भरोसा, आवास विकास ने सील किए भवनों को खुद ही तोड़ने को मजबूर हैं लोग, गाजा सरीखा मंजर

मेरठ। भले ही अदालत और सरकार में पैरोकारी का दम भने वाले कुछ भी कहें, लेकिन शास्त्रीनगर सेंट्रल वालों को जिस राहत की दरकार है और जिसके इंतजार में वो बेजार नजर आते हैं, वो अभी दूर-दूर तक भी नजर नहीं आ रही। पिछले सप्ताह लखनऊ से आए एक बड़े अफसर के दौरे और उससे पहले सीएम के एडवाइजर व मेरठ के पूर्व डीएम अवनीश अवस्थी और प्रमुख सचिव गृह के पी गुरूप्रसाद की सुप्रीमकोर्ट के आदेशों को यथावत पालन किए जाने के दावे के बाद लोगों की उम्मीद इस लड़ाई में अब धीरे-धीरे टूटती नजर आ रही हैं। वर्ना कोई वजह नहीं कि यदि उन्हें उम्मीद की कोई किरण नजर आती तो वो अपने भवनों को यूं अपने ही हाथों से भूखंड में आमादा करने पर उतारू नहीं होते। महानगर का सबसे व्यस्त कारोबारी इलाका शास्त्रीनगर और सेंट्रल मार्केट अब गाजा में तब्दील होता नजर आ रहा है। जिन बाजारों में चहल पहल और रौनक हुआ करती थी वहां सन्नाटे सरीखे हालात हैं। व्यापारियों के चेहरे की हवाइयां उड़ी हैं। उन्हें सबसे ज्यादा चिंता कारोबार के अलावा अब घर बचाने की है। संयुक्त व्यापार संघ और भाजपा समेत तमाम दलो के जो नेता साथ देने का दम भरते थे उनके भी दम फूल गए लगते हैं। साथ देना तो दूरी बात उनके मुंह से अब हमदर्दी का एक बोल तक नहीं फूट रहा है। शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट वालों को तमाम लोगों ने उनके हाल पर छोड़ दिया है। और इसी सब के बीच लड़ाई के नाम पर चंदा उगाही को लेकर जो कुछ भी सुनने को आया उसने तो रही सही कसर ही पूरी कर दी है।

पैसे खर्च कर लिखी जा रही बर्बादी की इबारत

शास्त्रीनगर और सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों पर दोहरी मार पड़ रही है। कारोबार तो खत्म किया ही जा चुका है अब लड़ाई आशियाना बचाने की है। आशियाना बचा रहे इसके लिए वो पैसे देकर जिसको अवैध बताया दिय गया है उसको तुड़वाने को मजबूर हैं। वक्त और हालात के मारे ये लोग पैसे खर्च कर अपनी बर्बादी की इबारत लिखने को मजबूर हैं ताकि 21 सितंबर को जो स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की जानी हैं उसकी बाद होने वाली सुनवाई के बाद शायद कोई राहत भरी खबर मिल जाए। लोगों का कहना है कि वो खुद इसलिए भी ध्वस्त करा रहे क्योंकि यदि आवास विकास की जेसीबी चली तो वो भी ध्वस्त हो जाएगा जिसको बचाया जा सकता है। इसी के चलते 44 भूखंडों में से कुछ के स्वामियों ने अपने प्रतिष्ठानों में किए गए अवैध निर्माण को हटाने का काम तेज कर दिया है। कई जगह प्रतिष्ठानों के हिस्से खुद तोड़े जा रहे हैं, ताकि सुनवाई से पहले यह रिपोर्ट दी जा सके कि संबंधित भूखंड अब निर्धारित मानकों के अनुरूप कर दिए गए हैं। हालांकि, सभी भूखंड स्वामियों ने अभी ध्वस्तीकरण शुरू नहीं किया है। कुछ प्रतिष्ठानों में अभी निर्माण जस का तस है।

सुनवाई को लेकर उड़ी है नींद

21 सितंबर को प्रस्तावित सुप्रीमकोर्ट की सुनवाई को लेकर केवल आवंटियों की ही नहीं बल्कि आवास विकास के अफसरों की भी नींद उउ़ी हुई है। जैसा की पहले सुनने में आया था कि अफसरों को यह भी डर सता रहा है कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का वाद ना दायर कर दिय जाए। माना जा रहा है कि इसी के चलते अंधाधुंध ध्वस्तीकरण कराया जा रहा है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 2 सितंबर को शास्त्रीनगर क्षेत्र में गठित संघर्ष समिति की ओर से मेरठ बंद का ऐलान किया गया था। इस दौरान यह घोषणा की गई थी कि 21 सितंबर तक आवास विकास की ओर से किसी तरह का ध्वस्तीकरण या बुलडोजर कार्रवाई नहीं की जाएगी।हालांकि इस से पहले ही आवास विकास की ओर से 44 भूखंडों को कुछ शर्तों के साथ डी-सील किया गया था। डी-सीलिंग की शर्तों के तहत भूखंड स्वामियों को अपने प्रतिष्ठानों को निर्धारित मानकों के अनुरूप करना है। साथ ही निर्माण में किए गए अवैध हिस्से को खुद हटाना है। आवास विकास को इन भूखंडों की स्थिति और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट 21 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई के दौरान पेश करनी है। वहीं दूसरी ओर आवास विकास परिषद की ओर से सील किए गए 44 भूखंडों में से कुछ भूखंड स्वामी अब अपने प्रतिष्ठानों में किए गए अवैध निर्माण को खुद हटाने में जुट गए हैं। इसका मकसद 21 सितंबर की सुनवाई से पहले अपने भूखंडों को निर्धारित मानकों के अनुरूप करना है। उनका प्रयास किसी भी तरह राहत भरी खबर का है, इसके लिए भले ही जेब से पैसे खर्च कर अपने निर्माण ध्वस्त ही क्यों ना कराने पड़ रहे हैं।

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