तारीख पे तारीख से सुप्रीम नाराजगी

Shekhar Sharma
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देश की अदालतों में 5.5 करोड़ (550 लाख) से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से जिला एवं अधीनस्थ (निचली) अदालतों में 5 करोड़, विभिन्न हाईकोर्ट्स में 62 लाख और सुप्रीम कोर्ट में 88,000 से अधिक मामले

इलाहाबाद हाईकोर्ट समेत देश भर के हाईकोर्ट में लंबित मामलों की बढ़ती जा रही फेरिस्त ने खुश नहीं देश की सबसे बड़ी अदालत

नई दिल्ली। देश भर के हाईकोर्ट में मामलों को निपटाने खासतौर से जमानत संबंधित मामलों को निपटाने को लेकर हो रही देरी से देश की सबसे बड़ी अदालत आहत और नाराज है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के उच्च न्यायालयों (HC) में लंबित जमानत याचिकाओं की भारी संख्या और सुनवाई में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताते हुए मामलों के त्वरित निपटारे के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हुए जमानत याचिकाओं को फास्ट-ट्रैक करने को कहा है। देश की अदालतों में 5.5 करोड़ (550 लाख) से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें से जिला एवं अधीनस्थ (निचली) अदालतों में 5 करोड़, विभिन्न हाईकोर्ट्स में 62 लाख और सुप्रीम कोर्ट में 88,000 से अधिक मामले शामिल हैं

तय मियाद में हो निपटारा

सुप्रीमकोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा है कि तय मियाद में मामलों को निपटारा किया जाना बेहद जरूरी है। उच्च न्यायालयों को जमानत याचिकाओं के निपटारे के लिए एक बाहरी समय-सीमा (deadline) निर्धारित करनी चाहिए। जमानत मामलों की सुनवाई सप्ताह या पखवाड़े में नियमित होनी चाहिए। देरी से बचने के लिए सॉफ्टवेयर-आधारित प्रणाली के माध्यम से इन्हें स्वतः (automatically) सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। सरकारी वकीलों या एजेंसियों के अनुरोध पर बिना किसी पुख्ता वजह के बार-बार सुनवाई नहीं टाली जानी चाहिए।जमानत मामलों की पहली सुनवाई से पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करना अनिवार्य कर दिया गया है।

इलाहाबाद व पटना हाईकोर्ट पर नजर

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद और पटना उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की भारी संख्या का विशेष रूप से उल्लेख किया है और वहां मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए एक निश्चित तंत्र विकसित करने को कहा है। एनडीपीएस (NDPS) जैसे मामलों में फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) रिपोर्ट समय पर प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों को राज्य के अधिकारियों के साथ यह मुद्दा उठाने को कहा गया है।

अदालत हैं जज नहीं

देश में अदालतें तो बनायी जा रही हैं, लेकिन जजों की नियुक्ति में हीलाहवाली की जा रही है। भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर जजों की संख्या बहुत कम है (लगभग 15 जज प्रति दस लाख)। इसके मुकाबले विकसित देशों में यह संख्या 100 से भी अधिक है। खाली पदों का समय पर न भरा जाना इसका एक मुख्य कारण है। अदालतों में लंबित मामलों में लगभग आधे मामलों के पक्षकार सरकारी विभाग होते हैं। एक विभाग द्वारा दूसरे विभाग पर मुकदमेबाज़ी करने और निरर्थक अपीलों (Appeals) के कारण अदालतों पर बोझ बढ़ता है। मामलों में लगातार स्थगन (Adjournments) और वकीलों व गवाहों का सुनवाई के दौरान अनुपस्थित रहना प्रक्रिया को धीमा करता है।

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