ईरान को मनाओ चीन से गिड़गिड़ा रहे ट्रंप

Shekhar Sharma
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डोनाल्ड ट्रंप का दौरे का मकसद चीन युद्ध विराम के लिए किसी भी तरह चीन को मनाए, यूएस की शर्तों पर लड़ाई खत्म नहीं चाहता ईरान

नई दिल्ली। अमेरिका के प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि चीन अपने असर का इस्तेमाल करते हुए चीन को लड़ाई खत्म करने के लिए तैयार करे और समझौते का जो मसौदा पाकिस्तान की मार्फत भेजा गया है। ईरान को बातचीत के लिए मनाया जाए। लेकिन वहीं दूसरी ओर ईरान से साफ कर दिया है कि जिन शर्तों पर अमेरिका समझौता चाहता है वो मान्य नहीं हैं। उन शर्तों पर ना तो युद्ध खत्म करने का समझौता हो सकता है और ना ही स्ट्रेट होर्मूज को खोला जा सकता है। इस समुंद्री रास्ते से यदि गुजरना है तो ईरान को टोल देना ही होगा।

बीजिंग के मेहमान हैं ट्रंप

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस वक्त बीजिंग की मेहमानवाजी का लुफ्त उठा रहे हैं। ईरान के साथ चल रहे तनाव और युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा (13 से 15 मई, 2026) का मुख्य उद्देश्य चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बातचीत करके बीजिंग को ईरान पर अपनी आर्थिक और कूटनीतिक पकड़ का इस्तेमाल करने के लिए राजी करना है। अमेरिका चीन से ईरान से तेल की खरीद रोकने की मांग कर रहा है, क्योंकि चीन द्वारा लगातार की जा रही तेल की खरीदारी तेहरान को आर्थिक जीवनदान (economic lifeline) दे रही है।

भारत समेत दुनिया के बाजारों में हा-हाकर

स्ट्रेट होर्मूज बंद होने की वजह से भारत समेत दुनिया के सभी देशों में तेल और गैस को लेकर हा-हाकर मचा हुआ है। भारत में आर्थिक मोर्चां पर जबरदस्त गिरावट आ रही है। पीएम मोदी ने लोगों कों वर्क होम की अपील की है।ईरान युद्ध के कारण होर्मोज़ जलडमरूमध्य में जहाजरानी बाधित हुई है और तेल बाजारों में अस्थिरता है। ट्रंप इस यात्रा के जरिए ऊर्जा सुरक्षा और द्विपक्षीय व्यापारिक तनावों (टैरिफ और तकनीकी प्रतिस्पर्धा) को सुलझाने का भी प्रयास कर रहे

डरे हुए अमेरिका के दोस्त

अमेरिका की मदद पर ईरान के मिसाइल अटैक की चेतावनी के बाद अमेरिका के तमाम मित्र देश यहां तक कि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश भी बुरी तरह से डरे हुए हैं। जंग के दौरान गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देशों ने अपने महत्वपूर्ण ठिकानों को ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से निशाना बनाए जाने से पैदा हुई रक्षा चुनौतियों को न केवल मिसाइलों के रास्ते की निगरानी की बल्कि अमेरिकी मदद पर भी सावधानीपूर्वक नज़र रखी जा रही है। ये देश ख़ुद को एक ऐसी जंग में खिंचा पाया जिसके बारे में उनके अधिकारियों का भी मानना था कि इस जंग से पहले उनसे सलाह तक नहीं ली गई। क्या इस संकट ने अमेरिका और खाड़ी के अरब देशों के बीच सुरक्षा समझौतों की सीमा को सामने ला दिया है? क्या यह युद्ध अमेरिकी सैन्य शक्ति पर उनकी निर्भरता को कम करेगा या इसके उलट इसे और मज़बूत करेगा?

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