छोड़ने को तैयार नहीं उम्मीद का दामन

Shekhar Sharma
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शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट के 44 भवनों को बनाने के लिए अभी भी बाकि है कानूनी रास्ते, उसी पर चल रही है कोशिशें

मेरठ। शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट के तमाम वो लोग खासतौर से वो 44 भी जिन पर सुप्रीमकोर्ट के आदेश के नाम र आवास विकास परिषद के अफसरों ने ध्वस्तीकरण की तलवार लटका दी है, उन्होंने अभी भी उम्मीद का दामन थामा हुआ है। दुनिया भले ही यह मान ले कि शासत्रीनगर सेंट्रल मार्केट वाले सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद यह जंग हार चुके हैं, लेकिन शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट वाले ऐसा कतई मानने को तैयार नहीं हैं और उन्होंने इस कानूनी लड़ाई को नए सिरे से लड़ने के लिए खुद को तैयार भी कर लिया है। उन्होंने साबित कर दिया है कि उम्मीद अभी भी कायम है। अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। इसके लिए उन्होंने सुप्रीमकोर्ट जाने की तैयारी पूरी कर ली है। केवल सुप्रीमकोर्ट ही नहीं जा रहे हैं, एक बार फिर सीएम और सांसदों तक अपनी बात पहुंचाने तथा सांसदों की मार्फत सरकार तक अपनी बात पहुंचने की भी तैयारी अंतिम दौर में है।

अब यह है करने जा रहे

शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट को राहत दिलाने की कोशिशों में लगने वालों का दावा है कि पीआईएल से फायदा होगा और जरूर होगा, कानून में इसका प्रावधान मौजद है। इसकी तीन वजह भी गिनायी गयी हैं। पहली वजह यह कि सुप्रीमकोर्ट का 14 जुलाई को आदेश व्यापक संदर्भ में दिया गया है केवल स्पेसिफिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल मार्केट के भूखंड संख्या 661/6 पर कथित अवैध रूप से बनाए गए कांप्लैक्स को तोड़ने का आदेश दिया। बाकी 44 दुकानों का नाम उस आदेश में नहीं था। वो बताते हैं कि कानून कहता है कि एक केस का फैसला दूसरे केस पर अपने आप लागू नहीं होता। दूसरी बड़ी वजह अनुच्छेद 1- भेदभाव। सुप्रीमकोर्ट का यह अगर आदेश पूरे देश पर है तो सिर्फ शास्त्री नगर क्यों?। यूं तो पूरे मेरठ में 90 फीसदी निर्माण अवैध हैं। इतना ही नहीं कई सरकरी इमारत बगैर मानचित्र पास कराए बना ली गयी हैं। और तो और नई सड़क पर नगर निगम ने जब कथित विवादित भूमि पर निर्माण शुरू कराया और वहां लाखों करोड़ खर्च भी कर डाला तब तक उस बिल्डिंग का मानचित्र स्वीकृत नहीं कराया गया था। इसी के चलते ही आवास विकास ने नोटिस भी दिया था, लेकिन बिल्डिंग सरकारी है, इसलिए सरकार कभी अपने अफसरों की गलती पर कार्रवाई नहीं करती बल्कि उन्हें बचाती है या बचने का पूरा मौका देती है। । जैसा नई सड़क पर नगर निगम की बिल्डिंग मेंं देखने को मिला। कोर्ट भेदभाव बर्दाश्त नहीं करता। PIL इसी लिए डाली जाती है।

पहले बसाओ फिर उजाड़ो

उम्मीद की तीसरी और अंतिम वजह “सुनवाई + पुनर्वास” का अधिकार। सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने फैसले हैं – 40 साल पुरानी दुकान तोड़ने से पहले सुनो और वैकल्पिक जगह दो। पूर्व में ऐसे तमाम केस हुए हैं जिनमें पीड़ितों को राहत दी गयी है। ऐसे केसों की लंबी फेरिस्त है। भारत भर की अदालतों में ऐसे ऐसे आदेश दिए हैं जिनमें उजाड़ने से पहले पुनर्वास की बात कही गयी है। उदाहरण के लिए दिल्ली सीलिंग केस 2006 सुप्रीम कोर्ट ने सीलिंग का आदेश दिया फिर भी हजारों दुकानदारों को “पुनर्वास नीति” और “समय” मिला। तुरंत नहीं तोड़ा गया। मुंबई हॉकर केस BMC तोड़ने गई थी हाईकोर्ट ने कहा “पहले लाइसेंस + जगह दो, फिर हटाओ”। स्टे मिल गया
लखनऊ हजरतगंज अवैध निर्माण पर नोटिस हाईकोर्ट ने कहा “सब पर एक साथ कार्रवाई करो, या किसी पर नहीं”। चयनात्मक कार्रवाई रोकी। मतलब: “तोड़ना है तो नियम से तोड़ो” – ये कोर्ट की लाइन है।

ठोस वजह है उम्मीदों की

शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट वालों को तत्काल राहत के लिए जो विकल्प सुझाए जा रहे हैं उनमें पहला पीआईएल दायर कर पहली राहत तत्काल स्टे की प्रार्थना है। इससे कम से इतना तो होगा कि आवास विकास के अफसरों ने सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के नाम पर ध्वस्तीकरण की जो तलवार लटका कर दहशत का माहौल कायम कर दिया है उससे तो राहत मिलेगी। जब तक सुनवाई चलेगी केस चलेगा तब तक कम से कम यह उम्मीद कायम रहेगी कि टूटेगा नहीं। सुनवाई के दौरान सभी 44 दुकानदार को अपना पक्ष रखने का मौका मिल जाएगा। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण जो न्याया का नर्सैगिक और प्राकृतिक नियम है वो यह कि उजाड़ने से पहले पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। जिनको तोड़ने की बात अफसर कर रहे हैं वो दो चार दिनों या रातों रात नहीं बना दी गयी हैं। चालिस साल से उनका वजूद कायम है। इसके अलावा न्याय की परिभाषा की सभी के लिए समान रूप से लागू किया जाए। कार्रवाई होगी तो केवल शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट में नहीं पूरे महानगर, प्रदेश और फिर देश में होगी यहां तक कि फिर तो जो सरकारी भवन कायदे कानून ताक पर रखकर बना दिए गए हैं, जेसीबी लगाकर उन्हें भी जमींदोज कर दिया जाए। आदेश पूरे प्रदेश में लागू करवाओ या किसी पर मत करो। सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर ध्वस्तीकरण की बात करने वाले अफसर यह ना भूलें कि साल 1982 में जब भूखंड आवंटित किए गए थे तब उस वक्त उनके बॉयलॉज में कहीं भी सेटबेक की बात का उल्लेख नहीं था। आवास विकास अफसर अपनी भूल की सजा आवंटियों काे ना दें। यह बात सुप्रीमकोर्ट को बेहतर तरीके से समझायी जा सकती है।

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