कोर्ट से जंग जीतने की कवायद

Shekhar Sharma
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शास्त्री नगर प्रकरण में पीआईएल दायर करने की तैयारी,सेंट्रल मार्केट व शास्त्रीनगर के बड़े व्यापारियों ने उठाया बीड़ा, कानूनी तरीके से जंग जीतने की कवायद

मेरठ। शास्त्रीनगर और सेंट्रल मार्केट में आवास विकास के साथ चल रही जंग को अब कानूनी तरीके से जीतने की कवायद में वहां के वाशिंदे जुट गए हें। इसके लिए उन्होंने सुप्रीमकोर्ट में पीआईएल (जनहित याचिका) दायर किए जाने की तैयारी कर ली है। बाजार के बड़े व्यापारियों ने इसका बीड़ा उठाया है। ऐसा नहीं कि इस कानूनी जंग में जिन बड़े व्यापारियों ने मोर्चा संभाला है वो केवल अपनी ही बात कोर्ट में रखेंगे, जिस पीआईएल को तैयार कराया जा रहा है, उसके दायरे में छोटे रिहायश यानि ईओडब्लू भी शामिल रहेंगे। आवास विकास के सेटबैक नोटिसों के बाद धरने पर बैठने वाली महिलाओं का कहना है कि उन्हें अब सिस्टम और मोदी योगी सरकार से तो कोई आस रह नहीं गयी है, लेकिन न्यायालय खासतौर से सुप्रीमकोर्ट पर पूरा भरोसा है कि उनके साथ न्याय किया जाएगा। उनका तर्क है कि आवास विकास परिषद ने साल 1982 में जब ये भूखंड आवंटित किए थे तो आवास विकास के बॉयलॉज में सेटबैक जैसी कोई बात नहीं कही गयी थी। सालों तक सैटबैक का कोई जिक्र तक नहीं किया गया था। उन्होंने बताया कि ३५ मीटर के मकान में आगे पीछे यदि सेटबैक छोड़ दिया जाएगा तो फिर आवास विकास के अफसर ये बताएं कि वो मकान रह ही कहां जाएगा। सेटबैक के बाद मकान किसी टॉयलेट या फिर खोली की मानिंद नजर आएगा। उसमें या तो सामान रख लो या फिर रह लो। ये तमाम बातें पीआईएल में शामिल की जाएंगी। यही बात सुप्रीमकोर्ट को समझानी है। दरअसल हो यह रहा है कि आवास विकास के अफसरों का रवैया अपनी गर्दन बचाने का है। आवास विकास के अफसरों ने सुप्रीम अदालत को यह नहीं बताया कि बीते चालिस सालों में क्यों कर वो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। और यदि ये उनके द्वारा आवंटित भूखंडों पर गलत तरीके से मकान बनाए गए हैं तो फिर चालिस साल तक उन्होंने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। वो अफसर कौन है जिन्होंने ऐसा होने दिया। जहां तक आवंटियों की बात है तो जब उन्हें आवास विकास ने साल 1982 में भूखंड आवंटित करते समय अपने बॉयलॉज में सेटबैक की बात ही नहीं बतायी तो फिर वो क्यों कर और कैसे सेटबैक छोड़ते।

सजा की हकदार सिर्फ अफसर

इस पूरे मामले में यदि सुप्रीमकोर्ट से मुकर्रर की गयी सजा का कोई हकदार है तो वो केवल आवास विकास के अफसर हैं। उन्होंने सरकार से जिस बात की सेलरी ली वो ड्यूटी अंजाम नहीं दी। और उनकी कारगुजारी या कहें लापरवाही और भ्रष्टाचार की सजा आवंटियों को क्यों दी जाए। यही बात तो सुप्रीमकोर्ट को पीआईएल के जरिये समझाने का प्रयास किया जाएगा।

शुरू से ही अफसरों का बचाव

शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट प्रकरण में सरकार और सिस्टम चलाने वालों का रवैया शुरू से ही अपने दागदार अफसरों को बचाने का रहा है। यदि ऐसा ना होता तो फिर क्या वजह है जो आवास विकास ने अपने जिन अफसरों पर थाना नौचंदी में मुकदमा खिलाया है उनके खिलाफ भी ना तो पुलिस और न ही आवास विकास ना ही सरकार कार्रवाई की हिम्मत जुटा पा रहे हैं। केवल सारा कसूरवार आवंटियों को ठहराय जा रहा है। लोगों का कहना है कि सिस्टम हो या फिर सरकार यदि वो ऐसा करेंगे तो इसको स्वीकार नहीं किया जाएगा। पीआईएल के जरिये सुप्रीमकोर्ट को वो सब बताने का प्रयास किया जाएगा जो आवास विकास के अफसरों ने छिपाया है।

कोर्ट तय करेगी मालिकाना हक

सेंट्रल मार्केट स्थित प्लाट संख्या 661/6 पर बनाए गए अवैध कांप्लेक्स को व्यापारी नेता के एक अफसर को चांटा प्रकरण के बाद एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जमीदोज कर दिया उस प्लाट का मालिकाना हक हाईकोर्ट में तय होगा। दरअसल आवास विकास ने उक्त प्लाट को जिस वीर सिंह नाम के शख्स को आवंटित किया था और उसके द्वारा जो डेयरी संचालित की जा रही थी, उस प्लाट के बाहरी हिस्से में बनी एक दुकान को व्यापारी नेता ने किराए पर लिया था, उसके बाद धीरे-धीरे वो पूरा प्लाट दोनों व्यापारी नेताओं के कब्जे में आ गया। वहां अवैध कांप्लैक्स बन गया उसमेें राजेन्द्र कुमार बड़जात्या, राजीव गुप्ता पुत्र हरिराम गुप्ता, सुषमा शर्मा पत्नी रामकुमार शर्मा, निशि गोयल पत्नी संजय गोयल, चंद्र प्रकाश गोयल पुत्र मुरारी लाल, जगप्रीत कौर पत्नी संदीप सिंह, अमरजीत सिंह पुत्र इकबाल सिंह, संदीप सिंह पुत्र हरभजन सिंह, विनोद अरोरा पुत्र केएल अरोरा, हरेन्द्र चौहान मैसर्स दुआ गारमेंटस, मनदीप सिंह मैसर्स सरदार जी प्रिंट, रजत अरोरा पुत्र विनोद अरोरा, राकेश मदान, संगीता जैन मैसस एमजी एसोसिएट्स, शकुंतला देवी मैसर्स हंसिका फैशन, पूनम मेहंदीरत्ता मैसर्स एमआई स्टोर, संगीता वाधवा पत्नी किशोर वाधवा, अलक अरोरा व प्रतीक वाधवा पुत्र किशोर वाधवा शामिल हैं। प्लाट 661/6 पर मालिकाना हक जताते हुए वीर सिंह का पुत्र दुष्यंत कुमार बैंसला पहले ही हाईकोर्ट में पहुंच गया है। उसने प्लाट पर मालिकाना हक जताया है। उसका कहना है कि पावर ऑफ अटार्नी का दुरूपयोग करते हुए कांप्लैक्स बना दिया गया। वहीं दूसरी ओर वीर सिंह के कानूनी वारिसों में सरला देवी पत्नी के अलावा दुष्यंत कुमार, नाराणण, योगिता व गीता शामिल बताए जा रहे हैं। मालिकाना हक हाईकोर्ट तय करेंगा।

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