
जीडीपी ग्रोथ 7.8 फीसदी के दावे के बाद सामने आए पूर्व वित्त सचिव का दावा तेजी से शून्य की ओर लुढ़क रही देश की GDP अभी महज 2.6
नई दिल्ली। मोदी सरकार और टीवी चैनलों पर बैठकर भाजपा के प्रवक्ता भले ही कुछ भी दावे क्यों ना करते हों, लेकिन अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ देश के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का दावा है कि देश की जीडीपी जो वास्तव में अभी महज 2.6% (और महंगाई/डिफ्लेटर एडजस्ट करने के बाद वास्तविक ग्रोथ शून्य के करीब) है, वो तेजी से शून्य की ओर लुढ़क रही है। जीपीपी को लेकर पीएम मोदी के दावों को उन्होंने हवाई करार दिया है।
बतायीं ठोस वजह
सुभाष गर्ग के अनुसार, सरकार ने पिछली समान तिमाही (Q1 FY26) की जीडीपी के अनुमान को अचानक ₹86 लाख करोड़ से घटाकर ₹80 लाख करोड़ कर दिया। चूंकि पुराना आधार (बेस) कम कर दिया गया, इसलिए इस साल की पहली तिमाही की जीडीपी (₹88.27 लाख करोड़) की तुलना जब इस संशोधित छोटे आंकड़े से हुई, तो विकास दर उछलकर 7.8% दिखने लगी। गर्ग का तर्क है कि यदि सरकार पिछले साल के वास्तविक मौजूदा मूल्यों वाले आंकड़े (₹86 लाख करोड़) को ही आधार मानती और उसमें बिना किसी बदलाव के इस साल की जीडीपी (₹88.27 लाख करोड़) की तुलना करती, तो नॉमिनल (Current Prices पर) जीडीपी ग्रोथ दर सिर्फ 2.6% आती। आमतौर पर रियल जीडीपी निकालने के लिए नॉमिनल जीडीपी में से महंगाई दर (GDP Deflator) को घटाया जाता है। गर्ग के मुताबिक, अगर असली नॉमिनल ग्रोथ महज 2.6% है और इसमें से लगभग 2.5% की महंगाई दर या डिफ्लेटर को कम कर दिया जाए, तो ‘वास्तविक अर्थों में (In Real Terms) देश की आर्थिक वृद्धि दर शून्य के बिल्कुल करीब’ पहुंच जाती है। इसी गणना को लेकर उन्होंने पूछा है कि देश के करीब ‘6 लाख करोड़ रुपये’ सांख्यिकीय फेरबदल में कहां गायब हो गए।
सरकार की सफाई
सरकार का कहना है कि जब भी बेस ईयर बदला जाता है, तो पुरानी तिमाहियों के डेटा को नई सीरीज के मापदंडों (जैसे जीएसटी, डिजिटल इकोनॉमी आदि) के हिसाब से दोबारा संशोधित (Retrofit) किया जाता है, जो एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।


