शेयर बाजार में निवेशकों के 27 लाख करोड़ डूबे

Shekhar Sharma
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क्रैश के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा जून 2026 में दी गई “आर्थिक सुनामी” (Economic Tsunami) की चेतावनी की चर्चा

नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार बुरी तरह क्रेश हो गया है। बाजार में भारी गिरावट देखी गई है, जिससे निवेशकों को करीब ₹20 लाख करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है। इस बाजार क्रैश के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा जून 2026 में दी गई “आर्थिक सुनामी” (Economic Tsunami) की चेतावनी की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है और विपक्ष इसे सच साबित होना बता रहा है। एक दिन पहले यानि भारतीय शेयर बाजार में सितंबर 2026 के आखिरी हफ्तों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। 28 सितंबर 2026 को बाजार में बड़ा ब्‍लडबाथ देखने को मिला।

सूचकांकों में गिरावट

28 सितंबर को BSE सेंसेक्स 1,124 अंक (1.52%) गिरकर 72,771.72 पर और NSE निफ्टी 360 अंक (1.56%) टूटकर 22,780.25 के स्तर पर बंद हुआ था। गिरावट का यह सिलसिला अगले दिन 29 सितंबर को भी जारी रहा। पिछले एक महीने की गिरावट के कारण बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन काफी घट गया है, जिससे निवेशकों की करीब ₹ 20 लाख करोड़ से ₹27 लाख करोड़ तक की राष्ट्रीय संपत्ति (wealth) साफ हो चुकी है। सिर्फ 28 सितंबर के एक ही सत्र में लगभग ₹7.4 लाख करोड़ से ₹9 लाख करोड़ स्वाहा हो गए थे। जून में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चेतावनी दी थी कि सरकार की आर्थिक नीतियां और अंतर्राष्ट्रीय बाजार के झटकों से देश को बचाने वाले जो ‘शॉक एब्जॉर्बर’ (सुरक्षा तंत्र) थे, उन्हें हटा दिया गया है। उन्होंने कहा था कि इसके कारण देश में आर्थिक संकट गहराएगा, जिसका असर रोजगार, महंगाई और शेयर बाजार पर दिखेगा। बाजार में आई इस हालिया गिरावट के बाद कांग्रेस पार्टी और उनके समर्थकों का दावा है कि राहुल गांधी की भविष्यवाणी सच साबित हुई है। उनका आरोप है कि सरकार ने समय रहते आर्थिक सुधारों और सुरक्षा उपायों पर ध्यान नहीं दिया।

भारतीय बाजार नहीं US बॉन्ड फर्ग्ट च्वाइस

निवेशकों की पहली पसंद अब भारतीय बाजार नहीं रहा बल्कि उन्हें यूएस बाॅन्ड लुभा रहे हैं। अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड बढ़कर 5.2% तक पहुंच गई है, जिससे निवेशक उभरते बाजारों (जैसे भारत) से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में लगा रहे हैं। भारतीय निवेशकों पर यह मार इसलिए पड़ रही है क्योंकि भारतीय शेयर बाजार पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। भले ही भारत की आंतरिक विकास दर (GDP) कागजों पर या हकीकत में 7% हो, लेकिन अगर दुनिया में युद्ध का माहौल है, कच्चा तेल महंगा हो रहा है, और विदेशी ताकतें अपना पैसा निकाल रही हैं, तो भारतीय बाजार उससे अछूता नहीं रह सकता। यह मार वैश्विक आर्थिक चक्र (Global Economic Cycle) का हिस्सा है।

सरकार को केवल कॉरपोरेट घरानों की चिंता

अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मानता है कि सरकार ने बड़े कॉर्पोरेट घरानों को टैक्स छूट (Corporate Tax Cuts) तो दी, लेकिन आम जनता के हाथों में पैसा पहुंचाने के उपाय नहीं किए। इसके कारण देश में निजी खपत और ग्रामीण मांग कमजोर बनी हुई है, जिससे कंपनियों के वास्तविक मुनाफे पर असर पड़ रहा है। सरकार की दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों के कारण देश का छोटा और मध्यम उद्योग (MSME सेक्टर), जो देश में सबसे ज्यादा रोज़गार देता है, संकट में है। रोज़गार के अभाव और कम वेतन के कारण घरेलू बचत ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर आ गई है, जिससे निवेशकों की क्रय शक्ति घटी है। सरकार की दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों के कारण देश का छोटा और मध्यम उद्योग (MSME सेक्टर), जो देश में सबसे ज्यादा रोज़गार देता है, संकट में है। रोज़गार के अभाव और कम वेतन के कारण घरेलू बचत ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर आ गई है, जिससे निवेशकों की क्रय शक्ति घटी है।


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