तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है ये दावे हवाई और बातें किताबी हैं

Shekhar Sharma
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जीएसटी का रिकॉर्ड कलेक्शन और तस्वीर का दूसरा रूख बता रहा है फाइलों में ही फकत मौसम गुलाबी है, आपके दावे किताबी हैं

नई दिल्ली। देश में आर्थिक हालात, उच्च मुद्रास्फीति (महंगाई), बेरोजगारी और सुस्त विकास दर के कारण दबाव में हैं। कृषि पर निर्भरता, विशाल जनसंख्या और नीतिगत चुनौतियों ने स्थिति को बदतर बना दिया है, जिससे लघु उद्योग प्रभावित हुए हैं और रोजगार के अवसर कम हुए हैं। हालांकि, कुछ रिपोर्टों में जीडीपी वृद्धि और निवेश के संकेत भी मिलते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौतियां बरकरार हैं। हालांकि बकौल सरकार देश का सकल जीएसटी कलेक्शन माह अप्रैल में 2.43 लाख करोड़ के अब तक के अपने उच्चतम स्तर पर जा पहुंचा है। जो साल 2025 माह अप्रैल के 2.13 करोड़ से 8.7 फीसदी ज्यादा है। सरकारक का दावा है कि जीएसटी कलेक्शन का बढ़ना देख में ऑल इव वैल और यह जश्न का न्यौता देता है। यह भी दावा है कि यह रिकॉर्ड वृद्धि मुख्य रूप से आयात पर कर और मजबूत घरेलू आर्थिक गतिविधि के कारण हुई, जो कर अनुपालन में सुधार को दर्शाता है।हालांकि तमाम ऐसे अर्थशास्त्री है जो वित्तमंत्रालय के अफसरों के इस दावे को खोखला और आडंबर वाला बता रहे हैं। उनका साफ कहना है कि नौकरियां खत्म हो रही हैं। महंगाई आसामान पर है। एमएसएमई सेक्टर ईधन संकट के चलते बुरे दौर से गुजर रहा है। लोग बेरोजगार हैं, इस माह्रौल में जश्न की बात किस मुंह से की जा रही है।

जीएसटी कलेक्शन पर नजर

अप्रैल 2026 में सकल GST राजस्व लगभग ₹2,42,702 करोड़ (₹2.43 लाख करोड़) रहा। पिछले साल अप्रैल (2025) की तुलना में 8.7% की उल्लेखनीय वृद्धि। रिफंड के बाद यह ₹2,10,909 करोड़ रहा। आयात पर कर में 25.8% की भारी वृद्धि ने इस आंकड़े को बढ़ाने में मदद की। पिछले साल अप्रैल (2025) की तुलना में 8.7% की उल्लेखनीय वृद्धि। रिफंड के बाद यह ₹2,10,909 करोड़ रहा। आयात पर कर में 25.8% की भारी वृद्धि ने इस आंकड़े को बढ़ाने में मदद की। अप्रैल में CGST, SGST, IGST और उपकर (Cess) के संयोजन से यह ऐतिहासिक आंकड़ा हासिल किया गया।

तस्वीर का दूसरा रूख स्याह

साल 2026 की शुरूआत से देश में बेरोजगारी और महंगाई चुनौती बनी हुई है। सरकार के पास इससे निपटने के लिए फिलहाल कोई ठोस योजना नजर नहीं आ रही है। सरकार के निर्णय बता रहे हैं कि हालात अभी ऐसे ही रहने वाले हैं। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, बेरोजगारी दर में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि महंगाई दर केंद्रीय बैंक के लक्ष्य के भीतर है, लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। ईरान से अमेरिका और इजरायल की लड़ाई के बाद तो स्थिति और भी ज्यादा खराब हुई है खासतौर से ईधन के दामों में अंधाधुंध वृद्धि किए जाने के बाद से। ईधन के दामों में वृद्धि का व्यापक असर बाजार पर साफ नजर आ रहा है।

बाजार में खरीदराें की भारी कमी

बाजार में जो रौनक होनी चाहिए वो नजर नहीं आ रही है। दुकानदारों खासतौर से खाने के खाने पीने के सामान से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि यदि सरकार ने तुरंत ही यूटर्न नहीं लिया तो हालात बहुत ज्यादा खराब होने वाले हैं। यह समय गैस की कीमतें बढ़ाने का कतई नहीं था। व्यापारियों की आशंका यहीं तक नहीं है। उनका कहना है कि इससे भी बड़ी मार की आशंका तेल की कीमतों में वृद्धि की आशंका को लेकर सता रही है।

बेरोजगारी उच्चतम दर पर

मार्च 2026 में भारत की बेरोजगारी दर बढ़कर 5.1% हो गई, जो फरवरी में 4.9% थी। यह अक्टूबर 2025 के बाद से उच्चतम स्तर है। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर (6.8%) ग्रामीण क्षेत्रों (4.3%) की तुलना में काफी अधिक है। युवाओं (15-29 वर्ष) के बीच बेरोजगारी एक प्रमुख समस्या बनी हुई है, जो मार्च 2026 में 15.2% तक पहुंच गई। 25 वर्ष से कम उम्र के शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 40% तक होने की रिपोर्ट है, क्योंकि शिक्षा और उद्योग की जरूरतों में अंतर है।

महंगाई की स्थिति

मार्च 2026 में भारत की वार्षिक खुदरा महंगाई दर 3.40% दर्ज की गई, जो पिछले महीने के 3.21% से थोड़ी अधिक है, लेकिन 4% के लक्ष्य के आसपास बनी हुई है। खाद्य महंगाई दर मार्च में 3.87% थी, जो फरवरी के 3.47% से अधिक रही। वित्त वर्ष 2027 में खुदरा महंगाई के 4.3% तक बढ़ने का अनुमान है, जो मुख्य रूप से खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण हो सकता है। बड़ी संख्या में स्नातक होने के बावजूद, कौशल की कमी के कारण औपचारिक नौकरियों (formal jobs) का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, जिससे मौसमी बेरोजगारी होती है।

श्रम क्षेत्र में भारी चुनौतियां

2026 में, भारत का श्रम बाजार (labour market) संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जहां “रोजगारविहीन विकास” (jobless growth) की स्थिति बनी हुई है। हालांकि बेरोजगारी दर अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत अधिक नहीं है, लेकिन शिक्षित युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी एक बड़ी चुनौती है

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