
अंतर्जनपदीय ट्रांसफर के बाद टीचरों के सामने सीनियरटी का संकट, वरीयता शून्य होने का मुद्दा लंबे समय से शिक्षकों के बीच चिंता और असंतोष का एक बड़ा कारण
मेरठ। बेसिक शिक्षा विभाग में अंतर्जनपदीय ट्रांसफर के बाद शिक्षकों की सीनियरटी यानि वरीयता शून्य होने का मुद्दा लंबे समय से शिक्षकों के बीच चिंता और असंतोष का एक बड़ा कारण रहा है। जब वर्षों के अनुभव और समर्पण के बाद भी एक वरिष्ठ शिक्षक को कम अनुभव वाले अधिकारी या सहकर्मी के अधीन काम करना पड़ता है, तो यह व्यवस्था उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है। टीचरों की तर्क है कि का यह सवाल पूरी तरह से न्यायसंगत है कि एक ही सेवा (परिषदीय शिक्षक सेवा) के अंतर्गत जिला बदलने पर उनकी पुरानी सेवा की गणना क्यों नहीं की जाती। वो करते ह हैं कि क्या जिला बदल जाने से सीनियरटी खत्म हो जाती है। जबकि ऐसा हो रहा है। इसको पूरी तरह से खारिज किया जाता है। एक टीचार की सीनियरटी यदि शून्य कर दी जाए तो उसको मानसिक व आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। प्रमोशन के नाम पर दूसरे जिले में भेज देने और फिर सीनियरटी को शून्य कर देने यानि नए जिले में ट्रांसफर पाकर जाने पर उस टीचर की सीनियरिटी वहां के टीचरों की सूची सबसे नीचे (शून्य से) शुरू होती है। इसका सीधा असर सहायक अध्यापकों से प्रधानाध्यापक या उच्च प्राथमिक विद्यालयों में प्रमोशन पर पड़ता है। जो टीचर अपने पुराने जिले में पदोन्नति के करीब थे, वे नए जिले में जूनियर हो जाते हैं और उन्हें पदोन्नति के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है।
लंबी सेवा के बाद भी जूनियर
दूसरे जनपद में तवादल के बाद सबसे जूनियर हो जाने की पारिवारिक और मानसिक कुंठा से अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती है। महिला शिक्षकों और दूर-दराज से अपने गृह जनपद लौटने वाले शिक्षकों को ट्रांसफर का लाभ तो मिलता है, लेकिन वर्षों की सेवा और अनुभव के बाद अचानक सबसे जूनियर बन जाने से उनके भीतर हीन भावना और मानसिक तनाव पैदा होता है। शिक्षक नेता बताते हैं कि हालांकि नियमों के तहत ट्रांसफर के बाद मूल वेतन तो सुरक्षित रहता है, लेकिन चयन वेतनमान या प्रोन्नत वेतनमान के लिए जरूरी सेवा अवधि की गणना को लेकर कई बार अस्पष्टता और पेचीदगियां उत्पन्न हो जाती हैं।
क्यों होता है ऐसा
सेवानिवृत्ति के मुहाने पर खड़े शहर के एक बेसिक के शिक्षक ने बताया कि ऐसा क्यों होता है, इसके पीछे प्रशासनिक और कानूनी कारण क्या हैं उनकी भी जानकारी जरूरी है। उन्होंने बताया कि सबसे मुख्य बात कैडर का जिला स्तर पर होना, उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली के अनुसार, सहायक अध्यापकों का कैडर जिला स्तर का होता है। इसका मतलब है कि प्रत्येक जिले का अपना अलग संवर्ग है और उस जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी यानि बीएसए नियुक्ता प्राधिकारी होते हैं। वरिष्ठता के नियम की यदि बात करें तो सामान्य प्रशासनिक नियमों के तहत, जब कोई कर्मचारी एक कैडर या यूनिट से दूसरी यूनिट में जाता है, विशेषकर अनुरोध के आधार पर ट्रांसफर के तहत, तो उसे नए कैडर में सबसे नीचे स्थान दिया जाता है ताकि वहां पहले से कार्यरत शिक्षकों की सीनियरटी प्रभावित न हो।


