ज्ञानेश के खिलाफ इंडिया गठबंधन ने दिखाई ताकत

Shekhar Sharma
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संसद भवन से निर्वाचन सदन तक मार्च और प्रदर्शन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी हिरासत में हंगामा

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आज (6 अक्टूबर 2026) संसद भवन से निर्वाचन सदन (चुनाव आयोग मुख्यालय) तक निकाले गए इस मार्च और प्रदर्शन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के अलावा विपक्ष (INDIA गठबंधन) के कई बड़े शीर्ष नेता और सैकड़ों सांसद शामिल हुए। इनमें प्रमुख रहे कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव, अभिषेक बनर्जी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के प्रमुख नेता (जिन्हें दिल्ली पुलिस ने हिरासत में भी लिया)। जयराम रमेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद, संजय राउत और प्रियंका चतुर्वेदी: शिवसेना (UBT) के सांसद समेत करीब दो दर्जन बड़े नेता और हजारों कार्यकर्ता शामिल हुए। विपक्षी दलों के नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों के खिलाफ संसद भवन से निर्वाचन सदन (चुनाव आयोग मुख्यालय) की ओर ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ निकाला। पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने नहीं दिया और रास्ते में रोक लिया। इस दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को बैरिकेडिंग पर चढ़ने के बाद पुलिस ने हिरासत में ले लिया और बस में बैठाकर ले गए। हिरासत में लिए जाने और मार्च रोके जाने के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने दिल्ली के आकाशवाणी भवन परिसर में लंबा धरना दिया और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे।

सामूहिक अरेस्टिंग

मुख्य नेताओं के साथ-साथ युवा कांग्रेस (IYC) और विपक्षी दलों से जुड़े अन्य छात्र संगठनों (जैसे NSUI, समाजवादी छात्र सभा) के युवा कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। दिल्ली पुलिस द्वारा मार्च को रोकने के लिए लगाए गए भारी बैरिकेड्स पर सबसे आगे युवा कार्यकर्ता ही डटे रहे। पुलिस के साथ उनकी तीखी नोकझोंक और धक्का-मुक्की हुई। जब पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लेना शुरू किया, तो सैकड़ों युवा कार्यकर्ताओं ने बसों के आगे लेटकर विरोध जताया। इसके बाद पुलिस ने नेताओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में इन युवा प्रदर्शनकारियों को भी हिरासत में लेकर अलग-अलग थानों में भेज दिया।

विपक्ष का भारी दबाव

विपक्ष के भारी दबाव और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बीच चुनाव आयोग ने विवादित नियमों में कुछ नरमी बरती है। अब नई प्रक्रिया के तहत, वोटर लिस्ट में सुधार या विसंगतियों को लेकर आम लोगों को चुनाव अधिकारियों के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने (Hearings) की बाध्यता खत्म कर दी गई है।

चुनाव आयोग ने माना अंतरिम मतभेद

चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक बयान में आंतरिक मतभेदों की बात को स्वीकार तो किया, लेकिन स्पष्ट किया कि विभिन्न दृष्टिकोणों का होना एक लोकतांत्रिक संस्था के काम करने का स्वाभाविक हिस्सा है। आयोग ने जोर देकर कहा कि अंततः स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े सभी निर्णय तीनों आयुक्तों की सहमति से सर्वसम्मति से ही लिए गए थे। नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 (Form 6) में जो घोषणापत्र मांगा जा रहा था, जिसमें पिछले चुनावी रोल संशोधन में माता-पिता के विवरण की मांग की गई थी, उसे भी हटा दिया गया है।

सरकार की सफाई

सरकार ने चुनाव आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया का पुरजोर समर्थन किया है। सरकार का कहना है कि यह कवायद किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि फर्जी वोटिंग रोकने और चुनावी प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता लाने के लिए वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा (Clean-up exercise) करने के उद्देश्य से की गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पूरे मामले (और फॉर्म-6 विवाद) पर चुनाव आयोग व सरकार को नोटिस जारी किए जाने के बाद, सरकारी पक्ष का कहना है कि वे इस मामले में अदालत के सामने अपना पूरा जवाब दाखिल करेंगे। अदालत ने विपक्ष की मांग पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने जैसा कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है।

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