चुनाव को लेकर सपा में घबराहट

Shekhar Sharma
4 Min Read

अपनी खामियों पर मंथन के बजाए भाजपा के संगठनात्मक कौशल से हैं परेशान

मेरठ। उत्तर प्रदेश विधानसभा को लेकर समाजवादी पार्टी में जबरदस्त घबराहट है। यह घबराहट लखनऊ में अखिलेश यादव की अध्यक्षता में हुई समाजवादी पार्टी की एक बैठक में साफ नजर आयी। जिसमें अखिलेश यादव ने कहा कि इस बार यदि सरकार नहीं बनी तो फिर कभी भी सरकार शायद नहीं बन सके। सूत्राें ने जानकारी दी है कि इस बैठक में सपा के रणनीतिकारों पर भाजपा के संगठनात्मक कौशल का खौफ साफ नजर आता था। उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित विधानसभा चुनावां के मद्देनजर यदि संगठन की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी इसमें काफी आगे है। भाजपा का संगठन जिला और शहर से लेकर बूथ स्तर तक नजर आता है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात यह कि भाजपा के कार्यकर्ता हर वक्त चुनावी मोड में नजर आते हैं। लखनऊ बैठक में मौजूद सपा के सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव की चिंता इसी बात को लेकर सबसे ज्यादा थी और यह बात उन्होंने इस बैठक में कह भी दी कि यूपी में पार्टी के नेताओं ने यहां तक कि विधायक और सांसदों ने संगठन की ओर ध्यान नहीं दिया केवल खुद ही ध्यान दिया है। यहां तक बताया जाता है कि यह भी कहा गया कि जिन्हें संगठन में पद दिए गए उन्होंने कमेटी तो बनायी लेकिन इस कमेटी से आगे वो भी नहीं बढ़ सके। इतना ही नहीं यह भी उलहना दिया कि कमेटियों कीे बैठक नियमित तौर पर नहीं की जाती थीं। हालांकि अखिलेश यादव ने  यूपी विधानसभा के प्रस्तावित चुनावों को देखते हुए कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर मजबूत होने और भाजपा के खिलाफ जनता के बीच जाने का निर्देश दिया है। लेकिन सपाई मान रहे हैं कि इस काम में बहुत देरी हो चुकी है।

एक एक को खड़ा कर लिया गया फीड बैक

लखनऊ में हुई इस बैठक में अखिलेश यादव ने जिन को बुलाया था, उन्हें एक-एक कर पूछा गया। मेरठ के महानगर अध्यक्ष आदिल चौधरी के बारे में तो सुनने में आया है कि जैसे ही वह फीड बैक के नाम पर खड़े हुए उनके पूरी तरह से खड़े होते ही अखिलेश यादव ने इशारा कर बैठने के लिए कह दिया और यहां तक जोड़ा कि आदिल तुम तो रहने ही दो तुम से ना हो पाएगा।

सपाइयों पर नहीं निजी ऐजेंसी पर विश्वास

सपा के जो लोग लखनऊ बैठक में पहुंचे थे उन्होंने जानकारी दी है कि अखिलेश यादव को अपने संगठन के नेताओं पर भरोसा नहीं है। शायद इसी लिए उन्होंने टिकट के लिए कोई निजी कंपनी हायर की है। टिकट उन्हीं को दिया जाएगा जिनकी सिफारिश या रिपोर्ट कार्ड सर्वे करने वाली निजी कंपनी बेहतर बताएगी। टिकट वितरण में संगठन का कोई रोल या महत्व संभवत इस बार चुनाव में नहीं रहेगा। बताया जाता है कि इस बात से संगठन के लोग खासे नाराज भी है, लेकिन इसके लिए खुद संगठन के वो लोग जिम्मेदार बताए जाते हैं जिन्होंने पद तो लिया लेकिन पद लेने के बाद नियमित रूप से पार्टी कार्यालय तक जाने की जहमत नहीं उठायी। वहीं दूसरी ओर यह भी सुनने में आया है कि जो कुछ भी लखनऊ की बैठक में हुआ उससे विधानसभा चुनाव में टिकट के कई दावेदारों की धड़कनें तेज हो गयी हैं। यह भी पता चला है कि पिछली बार जिन्हें टिकट दिए गए थे उनमें से पचास फीसदी से ज्यादा के टिकट कटने जा रहे हैं।द

TAGGED:
Share This Article