मार्केट में अब अन्ना हजारे की डिमांड नहीं

Shekhar Sharma
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भ्रष्टाचार के जिन मुद्दों को लेकर अन्ना ने आंदोलन किया वो मामले अदालत में ठहर नहीं सके और कांग्रेस नेताओं को बाइज्जत कर दिया बरी

नई दिल्ली। अन्ना हजारे की जन-स्वीकार्यता और राष्ट्रव्यापी प्रभाव अब 2011 के आंदोलन जैसा नहीं रहा। समय के साथ उनकी सार्वजनिक छवि और उनके आंदोलनों के प्रति लोगों के जुड़ाव में एक बड़ा बदलाव आया है। सरल भाषा में कहें तो राजनीतिक दलों के बीच अब अन्ना हजारे की स्वीकार्यता बिलकुल नहीं रह गयी है। कोई उन्हें पूछ नहीं रहा है। यूपी समेत कई राज्यों के चुनाव सिर पर हैं, लेकिन अन्ना हजारे का नाम कोई लेने को तैयार नहीं है। अन्ना हजारे को वक्त ने हाशिये पर धकेल दिया है। इसके अलावा लोगों का मानना है कि अन्ना हजारे केवल मनमोहन सिंह की सरकार गिराने के लिए कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली बन गए थे। जिन मुद्दों खासकर घोटालों के नाम पर आंदोलनकर अन्ना ने मनमोहन सरकार को गिरया था उन सभी घोटालों में अदालत ने कांग्रेस के नेताओं खासतौर से मनमोहन सिंह को बाइज्जत बरी कर दिया।

खुद लगाया साख पर बट्टा

अन्ना हजारें को लेकर लोगों का कहना है कि वह उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे ना ही जो वो बोलते थे वो बातें सही निकलीं। खासतौर से 2011 में ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ (IAC) आंदोलन से देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की बड़ी उम्मीदें जागी थीं। हालांकि, लोकपाल कानून बनने के बाद भी जमीन पर कोई चमत्कारी बदलाव महसूस नहीं हुआ, जिससे आम जनता में धीरे-धीरे निराशा बढ़ी। अन्ना के आंदोलन से निकले उनके मुख्य सहयोगी (जैसे अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी) सीधे राजनीति में शामिल हो गए। अन्ना खुद राजनीति से दूर रहे, लेकिन उनके आंदोलन के राजनीतिक इस्तेमाल ने उसकी साख को प्रभावित किया।

लोगों के मुद्दे बदले

पिछले एक दशक में देश का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। अब जनता और युवाओं के मुद्दे, राष्ट्रवाद, आर्थिक नीतियां, रोजगार और सोशल मीडिया नैरेटिव के इर्द-गिर्द घूमते हैं। न्ना हजारे के हालिया आंदोलन (जैसे किसानों के मुद्दे पर या लोकपाल की नियुक्तियों को लेकर) 2011 जैसी भारी भीड़ जुटाने में असफल रहे। आलोचकों और जनता के एक वर्ग का मानना है कि अन्ना हजारे वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था या सरकारों के खिलाफ उस आक्रामकता के साथ खड़े नहीं दिखे, जैसा उन्होंने यूपीए-2 (UPA-2) सरकार के समय दिखाया था। उनके बयानों में आई इस अनिश्चितता ने उनकी तटस्थ छवि पर सवाल उठाए।

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