आरक्षण में फंसी भाजपा को यूपी की चिंता

Shekhar Sharma
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आरक्षण का मुद्दा भाजपा के लिए बना है दोधारी तलवार, आरक्षण के बचाव के बाद भी मायावती व चंद्रशेखर के कोरवोट मिलने की गारंटी नहीं

नई दिल्ली। आरक्षण का शगूफा छोड़कर भाजपा खुद मुश्किल में फंस गयी है। आरक्षण को लेकर जिस प्रकार से सवर्ण जातियों ने मोर्चा खोल दिया है उसको लेकर भारतीय जनता पार्टी की सबसे ज्यादा चिंता यूपी को लेकर ही है।। भाजपा के तमाम नेता जिनमें राजनाथ सिंह और अमित शाह भी शामिल हैं उन्होंने बेहद कठोर लहजे में कहा है कि भाजपा के रहते हुए आरक्षण को किसी के बाप में हिम्मत नहीं जो उठा दे। आरक्षण का शगूफा छोड़ने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि दलित वोट चंद्रशेखर और मायावती जैसे नेताओं से खिसक पाएंगे। हां इतना जरूर है कि ऊंची जाति वाले खासतौर से पूर्व के ठाकुर और ब्राह्मण जरूर भाजपा से किनारा कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश में ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ या ‘आरक्षण सुधार आंदोलन’ के कारण भाजपा के पारंपरिक सवर्ण (ऊंची जाति) वोट बैंक में कुछ नाराजगी देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह असंतोष गहराता है, तो प्रमुख ऊंची जातियां भाजपा के पाले से खिसक सकती हैं या निष्क्रिय हो सकती हैं।

नफा होगा या नुकसान

उत्तर प्रदेश में आरक्षण और सवर्णों (ऊंची जाति) के आंदोलन को लेकर भाजपा के सामने एक राजनीतिक दुविधा की स्थिति बन गई है, जिससे पार्टी को चुनावी नफा-नुकसान दोनों का सामना करना पड़ सकता है।दिल्ली के जंतर-मंतर और उत्तर प्रदेश में सवर्ण युवाओं (जैसे हर्ष दुबे के नेतृत्व में ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’) ने जातिगत आरक्षण का विरोध किया है और आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग उठाई है। सपा प्रमुख और अन्य विपक्षी दलों ने इसे आरक्षण और संविधान को कमजोर करने की साजिश बताकर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्‍यकों) के वोटर्स को लामबंद करना शुरू कर दिया है।

छिटक सकता है भाजपा का कोरवोटर

ऊंची जातियां (ब्राह्मण, ठाकुर आदि) यूपी में भाजपा का पारंपरिक और मजबूत कोर वोट बैंक रही हैं। यदि इन वर्गों में यह संदेश गया कि सरकार उनकी आर्थिक या आरक्षण-सुधार संबंधी मांगों को अनसुना कर रही है, तो उनका एक हिस्सा छिटक सकता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में ठाकुर और ब्राह्मण और वेस्ट यूपी में बनिये भाजपा की आरक्षण नीति से नाराज बताए जा रहे हैं। विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर दलितों और पिछड़ों में यह डर पैदा कर सकता है कि भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहती है, जिससे भाजपा के ओबीसी और दलित समर्थन पर असर पड़ सकता है।

उठाना पड़ सकता है खामियाजा

आरक्षण के शगूफे के बाद भाजपा को जिन सवर्ण जातियों की नाराजगी की कीमत उठानी पड़ सकती है उनमें ब्राह्मणों की यदि बात करें तो उत्तर प्रदेश की आबादी में इनकी हिस्सेदारी लगभग 9% से 14% है। पिछले चुनावों में इन्होंने लगभग 90% वोट भाजपा को दिए थे। शिक्षा और नौकरियों में योग्यता (मेरिट) के मुद्दे पर यह वर्ग सबसे ज्यादा मुखर है। ठाकुर / राजपूत भाजपा का बेहद मजबूत और पारंपरिक समर्थक रहा है। हालांकि, हाल के समय में प्रतिनिधित्व और नीतियों को लेकर इनमें यदा-कदा असंतोष दिखा है। इस आंदोलन में करणी सेना जैसे राजपूत संगठनों की भागीदारी भी देखी जा रही है। भूमिहार जो मुख्य रूप से पूर्वांचल के क्षेत्रों में प्रभावशाली हैं। आरक्षण के आर्थिक आधार और समीक्षा की मांग को लेकर यह वर्ग भी सामान्य श्रेणी के युवाओं के साथ खड़ा नजर आ रहा है। श्य (बनिया) और कायस्थ की बात करें तो मुख्य रूप से शहरी और व्यावसायिक क्षेत्रों में मजबूत यह जातियां सीटों की कमी और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में सामान्य वर्ग के अवसरों को लेकर चिंतित हैं। भाजपा ने पिछले दशक में गैर-यादव ओबीसी और दलितों को जोड़कर अपना जनाधार बढ़ाया है। सवर्ण मतदाताओं को लगता है कि नए सामाजिक समीकरणों के कारण पार्टी में उनका प्रभाव कम हो रहा है।

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