SIR विवाद से खतरे में चुनाव आयोग की साख

Shekhar Sharma
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ज्ञानेश कुमार के लिए इस समय एक बेहद गंभीर संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक मुसीबत

नई दिल्ली। SIR (Special Intensive Revision)/मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के लिए इस समय एक बेहद गंभीर संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक मुसीबत बन चुका है। इस मुद्दे ने न केवल उनके नेतृत्व बल्कि पूरे चुनाव आयोग की साख को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सबसे महत्वपूर्ण अगस्त 2026 में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड में दर्ज कराया कि डिजिटल पोर्टल पर फॉर्म-6 में किए गए बदलाव “अनाधिकृत और गैर-कानूनी” थे, क्योंकि इसके लिए पूरे चुनाव आयोग की जरूरी आम सहमति नहीं ली गई थी। वहीं दूसरी ओर सुप्रीमकोर्ट भी इस मामले में बेहद सख्त है। चीफ जस्टिस ने स्पष्ट कहा है कि भले ही उन्होंने अभी ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया है, लेकिन यदि रिकॉर्ड से यह साबित हुआ कि फैसले बिना सर्वसम्मति (unanimity) या कानून तोड़कर लिए गए थे, तो अदालत एसआईआर से जुड़े फैसलों को निरस्त या वापस (recall) कर देगी।

ज्ञानेश के गैर-कानूनी कदम

चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार के साथी आयुक्तों ने डेटाबेस के सेंट्रलाइजेशन और फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को “अनाधिकृत और अवैध” तक करार दिया था। यह आंतरिक मतभेद ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक दबदबे के खिलाफ सबसे पुख्ता सबूत बनकर उभरा है। इसके अलावा पूर्व नौकरशाहों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने भी उनके खिलाफ 6 गंभीर आरोपों के साथ एक ‘जनता का महाभियोग’ (People’s Impeachment) नोटिस जारी किया है। विपक्षी सांसदों द्वारा संसद में उनके खिलाफ महाभियोग (Impeachment) का नोटिस दिया गया है, जिससे वह भारत के इतिहास में ऐसे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बन गए हैं जिनके खिलाफ ऐसा कदम उठाया गया हो।

सुप्रीमकोर्ट की ना यानि ज्ञानेश की मुसीबत

5 अक्टूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि अदालत ने फॉर्म-6 में किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है। प्रीम कोर्ट को यह सख्त स्पष्टीकरण इसलिए देना पड़ा, क्योंकि चुनाव आयोग ने इस विवाद पर अपना बचाव करने के लिए कोर्ट के ही एक पुराने फैसले का सहारा लिया था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा: “हम यह बिल्कुल साफ कर रहे हैं, फॉर्म-6 में कोई भी संशोधन हमारी तरफ से मंजूर नहीं किया गया है।”

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