डोर टू डोर ठेके को लेकर ना तो RTI के जवाब में और ना ही CPGRAMS पर तस्वीर साफ है, ठेके के मामले में कौन सी कार्रवाई मानी जाए सही
मेरठ। कैंट बोर्ड मेरठ का करोड़ों का डोर टू डोर ठेका और इस ठेके को लेकर दो सीईओ की परस्पर विरोधी कार्रवाइयों ने पूरे मामले को उलझा कर रख दिया है। इसको लेकर कैंट बोर्ड प्रशासन से उठ रहे सवालों के जिस उत्तर की उम्मीद की जा रही है वह नहीं मिल रहे हैं। यहां तक कि कैंट बोर्ड प्रशासन ने RTI और CPGRAMS में भी बताए बताने के लगता है कि छिपाने का ही प्रयास अधिक किया है। डोर टू डोर ठेके के एक वर्क ऑर्डर को लेकर सीईओ नावेन्द्र नाथ और सीईओ जाकिर हुसैन की कार्रवाइयों में परस्पर विरोध साफ नजर आता है।
क्लीनचिट है कार्रवाई क्यों
छावनी इलाके में घर-घर से कूडा कचरा संग्रह करने के लिए कैंट बोर्ड ने सीईओ नावेनद्र नाथ के कार्यकाल में ठेका छोड़ा। जाकनारों के मुताबिक 30 मार्च 2021 को ठेकेदार को वर्क ऑर्डर जारी दिया गया। इसके सापेक्ष ठेकेदार ने 2 अप्रैल 2021 को ही काम शुरू करने की सूचना कैंट बोर्ड प्रशासन को दे दी। ठेकेदार की इस सूचना पर तब के सीईओ नावेन्द्र नाथ ने 4 अप्रैल 2021 को ठेकेदार को अपनी लिखित स्वीकृति दे दी। मसल डोर टू डोर ठेके को लेकर ऑल इज वैल मान लिया गया। इसके बाद ठेकेदार ने काम शुरू कर दिया है डोर टू डोर ठेके के लिए जो एग्रीमेंट कैंट बोर्ड ने किया उसके सापेक्ष ठेकेदार को करोड़ों के भुगतान भी किए गए। यहां तक भी सब कुछ ठीक चलता रहा। ठेकेदारों को करोड़ों रुपए के इन भुगतानों के बाद यह साफ हो गया कि कहीं कोई लकूना यानि गड़बड़ नहीं है। सब कुछ ठीक है।
यहां फंसा पेंच
कैंट बोर्ड के डोर टू डोर ठेके में जो पेंच फंसा वो वर्तमान सीईओ के द्वारा वर्ष 2024-25 में जिस वर्कआर्डर को सीईओ नावेन्द्र नाथ ने ऑल इज वैल मान लिया, वर्तमान सीईओ ने उसी Work Order को “Backdated Work Order” मानते हुए विभागाध्यक्ष सहित दो कर्मचारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की। हालांकि अनुबंध के आधार पर ठेकेदार को करोड़ों रुपये का भुगतान भी किया गया। बस यही से इस मामले में पेंच फंस गया और फाइलों में लगे कागजातों को जानकारों ने परस्पर विरोधी मान लिया।
ठेकेदार के सवालों से भाग रहे अफसर
डोर टू डोर ठेके के तब के साझीदार सचिन गोयल के सवालों ने कैंट बोर्ड के अफसर कन्नी काटते प्रतीत होते हैं। सचिन गोयल ने आरटीआई में पूछा है कि ठेकेदार फर्म के तत्कालीन अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता सचिन गोयल ने RTI और CPGRAMS के माध्यम से यही मूल प्रश्न उठाया है:
“जिस Work Order को 2021 में स्वीकार किया गया, जिसके आधार पर कार्य हुआ और करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया, उसी Work Order को बाद में Backdated बताकर कर्मचारियों को दंडित कैसे किया जा सकता है?” बकौल सचिन गोयल लेकिन आज तक कोई स्पष्ट, reasoned और record-based उत्तर नहीं दिया गया और मूल अभिलेखीय प्रश्न को ही अनुत्तरित छोड़ दिया गया। उनका कहना है कि वह स्वयं उस पत्र के हस्ताक्षरकर्ता हैं, जिस पर तत्कालीन CEO ने कार्य प्रारम्भ की स्वीकृति दी थी। इस मामले में दो अधिकारियों के दो विपरीत दृष्टिकोण पहला दृष्टिकोण — तत्कालीन CEO नवेन्द्र नाथ इसके इतर दूसरा दृष्टिकोण — वर्तमान CEO जाकिर हुसैन का नजरिया भुगतान के लिए वैध और कैंट बोर्ड के दो कर्मचारियों को दंड के लिए अवैध ये बाते एक साथ नहीं मानी जा सकतीं। यदि Work Order सही था तो दंड का आधार क्या था? और यदि Work Order गलत था तो उसी आधार पर कार्य स्वीकार कर करोड़ों रुपये का भुगतान किस आधार पर किया गया? करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का मामला, यह केवल दो कर्मचारियों की सजा का मामला नहीं है बल्कि कैंट बोर्ड के दो सीईओ के बीच परस्पर विरोधाभासी मामला है।
इस सवाल का जवाब मिलना चाहिए कि “करोड़ों रुपये के भुगतान का आधार सही था या उसी आधार पर दी गई सजा सही थी?” जब तक इन दोनों CEOs के विपरीत दृष्टिकोणों का स्पष्ट अभिलेखीय जवाब नहीं आता, तब तक संदेह और विवाद बना रहना स्वाभाविक है।


