टाॅयलेट है लेकिन धोने के लिए पानी नहीं

Shekhar Sharma
7 Min Read


दरवाजे तक नहीं, बैठने के बाद बार-बार पड़ता है खांसना ताकि उस ओर कोई आ ना जाए, नाले नालियों का पानी है घुस आता

मेरठ/ शहर में पब्लिक टॉयलेट तो हैं लेकिन तमाम ऐसे भी हैं जिनमें ना तो धोने के लिए भीतर लगी टोटी से पानी आता है और ना ही उन पर दरवाजे लगे हैं। या तो फ्रेश होकर इग्लिंश स्टाइल में पेपर यूज कर लीजिए या फिर टॉयलेट में बैठने से पहले अपने साथ कोई डिब्बा या बोतल लेकर आए जिसमें पानी भरकर फ्रेश होने के बाद धुलाई कर सकें, वर्ना पब्लिक टॉयलेट में जहां चर नुमा जगह पर पानी भरा हुआ है, फ्रेश होने के बाद वहां तक अपनी पेंट को पकड़ कर जाइए उसके बाद वॉश कीजिए और सारा काम निपट जाए तो टॉयलेट यूज करने के लिए दो या फिर पांच या दस रुपए वहां भी बैठा हो उसके सामने पड़ी टेबल पर रख दीजिए। सूरज कुंड स्थित नगर निगम के पब्लिक टॉयलेट की मोटर दो साल से खराब पड़ी है। जब मोटर ही नहीं है तो पानी आने का सवाल ही नहीं। जब पानी ही नहीं आए तो फिर फ्रेश होने के बाद धोने के लिए पानी तो भूल ही जाइए। नगर निगम अफसरों की बात करें तो दावे स्वच्छता सर्वेक्षण को लेकर किए जा रहे हैं और शहर शहर में पब्लिक टॉयलेट की बात करें तो सूरज कुंड जहां पर महापौर का कैंप कार्यालय है, नगर निगम के तमाम आला अफसर, सूबे की डबल इंजन सरकार के तमाम भाजपाई और विपक्ष के पार्षदों की जहां दिन भर आवाजाही रहती हैं, वहां टॉयलेट की स्थित देखने के बाद इन्हें यूज करने का दिल नहीं करेगा भले ही किसी होटल में ही फ्रेश होने के लिए जाना पड़े। हालात है कि इनको यूज करने की उठाने की हिम्मत नहीं होती। सबसे ज्यादा असुविधा का सामना तो महिलाओं को करना पड़ता है।

टॉयलेट पर ताले या फिर गंदगी

शहर में पब्लिक टॉयलेट ऐसे हैं जिनमें से कई पर ताले लटक रहे हैं। सूरजकुंड इलाके में जहां महापौर का कैंप कार्यालय है, वहां से आगे चलकर हंस चौराहे के समीप काफी समय पहले निर्माण कराए गए शहर में पब्लिक टॉयलेट पहले तो अरसे तक उद्घाटन कर इंतजार करते है। उद्घाटन के इंतजार में वहां ताले झूलते रहे। हालत यह हो गयी कि बाद में उनके दरवाजे तक गल कर टूट गए और फिर वो इस लायक नहीं रह गए कि यूज किया जा सके। अधिकांश में नियमित सफाई नहीं होती है, जिससे वहां हमेशा गंदगी और बदबू फैली रहती है। कई शौचालयों में पानी की आपूर्ति बंद है, दरवाजे टूटे हुए हैं और बिजली या लाइट की व्यवस्था नहीं है। पुराने या क्षतिग्रस्त शौचालयों की समय पर मरम्मत नहीं कराई जाती, और कई जगहों पर इन्हें पूरी तरह बंद कर दिया गया है। देखरेख न होने के कारण कई स्थानों पर इनका गलत इस्तेमाल होने की खबरें भी सामने आती हैं। महानगर के वार्ड 28 का पब्लिक टॉयलेट निगम स्टाफ ने ही ध्वस्त कर दिया। वहां के लोग अब परेशान हैं। महताब सिनेमा के पास 70 से ज्यादा जर्जर सरकारी पब्लिक टॉयलेट बुरी हाल में हैं। इनकी दशा सुधारने को पिछले माह मुस्लिम नेता बदर अली ने नगर निगम पहुंचकर अफसरों को घेरा था। सिविल लाइन वीआईपी माना जाता है, लेकिन इस वीआईपी इलाके के पब्लिक टॉयलेट भी बुरी हालत में हैं।

शौचालय में सब्जी मंड़ी

कुछ पहले एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जो मेरठ के मवाना का बताया गया है। उसमें नजर आनपे वाला एक सरकारी पब्लिक टॉयलेट सब्जी मंड़ी में तब्दील कर दिया गया नजर आता था। लेाग टॉयलेट के भीतर से सब्जी लाते ले जाते नजर आ रहे थे। सरकारी पब्लिक टॉयलेट की बात करें तो  बेशुमार गंदगी के चलते इनका इस्तेमाल करना तो दूर इनसे निकलने वाली दुर्गंध की वजह से इनके आस-पास से निकलना तक दूभर है। 80 प्रतिशत पब्लिक टॉयलेट वास्तव में इस्तेमाल के लायक ही नहीं हैैं। नगर निगम ने पब्लिक टॉयलेट्स तो बना दिए, लेकिन मानकों को पूरी तरह अनदेखा किया गया है। हालत यह है कि पब्लिक टॉयलेट्स में बेसिक साफ सफाई तक की सुविधा तक नहीं है। इतना ही नहीं, जो पब्लिक टॉयलेट्स पिछले स्वच्छता सर्वेक्षण में तैयार किए गए थे। उनमें बीते एक साल से ताला लटका है। यूरिनल से लेकर टॉयलेट सीट के पास लगी टोंटियां तक टूट चुकी हैं। शौचालयों में पानी तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

ये होना है जरूरी

सरकारी पब्लिक टॉयलेट को लेकर कुछ मानक तय किए गए हैं जिनके मुताबिक दीवार पर स्वच्छता का संदेश देती पेंटिंग होनी चाहिए
सामुदायिक व सार्वजनिक शौचालय की सफाई होनी चाहिए। हैंडवाश के लिए साबुन और तौलिए की व्यवस्था होनी चाहिए। टॉयलेट में सेनेटरी वेंडिग मशीन, हैंड ड्रायर और इंसीनरेटर की व्यवस्था होनी चाहिए। शौचालय परिसर में गमले रखे होने चाहिए। शौचालय पर 24 घंटे कर्मचारी की मौजूदगी होनी चाहिए। मेरठ में कई स्थानों पर शाम पांच बजे के बाद सरकार पब्लिक टॉयलेट पर ताला झूलने लगता है वो फिर अगले दिन सुबह आठ नौ बजे के करीब खुलता है। शहर के सभी पब्लिक व कम्यूनिटी टॉयलेट सीवर लाइन या सेप्टिक टैंक से जुड़े होने चाहिए। टॉयलेट से ओपन डिस्चार्ज नहीं होना चाहिए। सीवर का वेस्ट सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पर शोधित होना चाहिए। दिव्यांगों के लिए टायलेट के बाहर रैैंप की सुविधा होनी चाहिए।

रख-रखाव में लापरवाही

नगर निगम के रिकार्ड के अनुसार शहर में अभी तक करीब सौ सार्वजनिक यूरिनल बने हुए हैं। इनमें से आधे बुरी हालात में हैं, मलिन बस्तियों में सार्वजनिक शौचालयों की कमी है लेकिन शहर के प्रमुख मार्गों और चौराहों पर बनाए गए 20 सार्वजनिक पिंक ब्लू शौचालय भी पुरसा हाल नहीं। इन शौचालयों में सुविधा के नाम पर किराया वसूला जाता है। इसको लेकर नगर स्वास्थ्य अधिकारी से संपर्क का प्रयास किया लेकिन दूसरी ओर कॉल रिसीव नहीं की गई।

===

TAGGED:
Share This Article