
एनडीटीवी, टाइम्स नाउ, रिपब्लिक टीवी भारत, रिपब्लिक टीवी, इंडिया टूडे, आज तक, एबीपी, सुदर्शन न्यूज, सीएनएन न्यूज 18, इंडिया टीवी की खतरे में विश्वसनियता
नई दिल्ली। इंडियन चैनलों की TRP ने दुनिया की मीडिया की नजरों में बड़ी गिरावट दर्ज की है। नार्वे प्रकरण के बाद दुनिया भर में एकाएक इंडियन मीडिया को लेकर तमाम तरह की नुकताचीनी की जाने लगी। इंडियन मीडिया को कुछ ने वैश्याओं से बुरा बता दिया। ऐसा कहने वालों का तर्क है कि वैश्याएं जिस्म बेचती हैं जमीर नहीं, लेकिन इंडियन मीडिया ने ताे जमीर भी बेच दिया है। पैसे के लिए इंडियन मीडिया कुछ भी का सकता है। भारत में प्रचलित गोदी मीडिया शब्द एकाएक विदेशों में भी चर्चा में आ गया। गोदी मीडिया के दोषियों पर आरोप है कि ईमानदार पत्रकारिता का अभ्यास करने के बजाय, ये फर्जी खबरों और भड़काऊ कहानियां चलाते हैं, जो की प्राय असत्य होती है तथा भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले केंद्र और राज्य सरकारों के एजेंडे का समर्थन करता है तथा इनके मालिक कॉर्पोरेट घराने है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इंडिया के कुछ चैनलों की रिपोर्टिंग को लेकर मीम बना दिए गए।
विदेशों में TRP धड़ाम
सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा टीवी समाचार चैनलों की टीआरपी (TRP) रेटिंग को रोकने के सरकारी फैसलों और विदेशों (जैसे यूके और अमेरिका) में ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARB) जैसे निकायों के दर्शकों के आंकड़ों में यह गिरावट दर्ज की गई है। विदेशों में रहने वाले भारतीय डायस्पोरा के बीच समाचार उपभोग के पैटर्न में बदलाव और अत्यधिक सनसनीखेज सामग्री के बजाय डिजिटल मीडिया की ओर झुकाव इसके मुख्य कारण हैं। चूंकि विदेशी रेटिंग एजेंसियां (जैसे ब्रिटेन की BARB) विशिष्ट भारतीय चैनलों की पहुंच (Reach) को अलग से मापती हैं, इसलिए इनकी व्यूअरशिप में कमी देखी गई है, क्योंकि दर्शक अब ऑन-डिमांड डिजिटल सामग्री को प्राथमिकता देने लगे हैं।
गोदी मीडिया के तमगे वाले चैनल
एनडीटीवी, टाइम्स नाउ, रिपब्लिक टीवी भारत, रिपब्लिक टीवी, इंडिया टूडे, आज तक, एबीपी, सुदर्शन न्यूज, सीएनएन न्यूज 18, इंडिया टीवी सरीखे नाम शामिल हैं। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर शकुंतला बणाजी ने भारत में मीडिया की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि “पिछले छह वर्षों में, भारतीय मीडिया की हालत बहुत खराब हो गयी है,” और कहा कि “इन मीडिया चैनेलों की रिपोर्टों में सच्चाई या ज़िम्मेदारी की कोई झलक नहीं है।”
आलोचकों जिनमें बड़ी संख्या भारत के पूर्व संपादकों व टीवी चैनल के पूर्व पत्रकारों और आम जनता के एक वर्ग का मानना है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में झुक गया है। इन पर बेरोजगारी, महंगाई जैसे वास्तविक मुद्दों को उठाने के बजाय सरकार का गुणगान करने, धार्मिक ध्रुवीकरण करने और विपक्ष से सवाल न पूछने के आरोप लगते हैं। यह आरोप काफी हद तक सही भी लगता है क्योंकि टीवी चैनल जिनको गोदी का तमगा हासिल है, खामियों को लेकर सरकार से सवाल के बजाए विपक्ष को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं।


