खुद तोड़ लो हमने तोड़ा तो होगी परेशानी

Shekhar Sharma
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छोड़ने को तैयार नहीं उम्मीद का दामन

आवास विकास अफसरों की कंपाउंडिंग की रकम वापस करने की पेशकश, मिटिंग में लोगों से मांगी अर्जी, कई ने शुरू कर दी तोड़फोड़

मेरठ। आवास विकास परिषद के अफसरों ने सुप्रीमकोर्ट के 14 जुलाई के आदेश के बाद जिन 44 भवनों को सील किया है, उनके साथ आज शाम की गई मिटिंग में सलाह दी कि वो लोग अपने सेटबैक छोड़ने के लिए खुद ही तोड़फोड़ शुरू कर दें, वर्ना यदि आवास विकास ने तोड़फोड़ शुरू कर दी तो दिक्कत में आ जाओगे। दरअसल आवास विकास के अफसरों के न्योते पर 44 भवनों के स्वामी आवास विकास ऑफिस पहुंचे थे। वहां तमाम बातों के बाद आवास विकास के अफसरों ने दो टूक कहा कि सभी सील भवनों के स्वामी खुद ही सेटबैक के लिए तोड़फोड़ शुरू कर दें। उन्होंने यह भी कहा कि जिन्होंने अपने भवनों की कंपाउंडिंग के लिए राशि जमा की है वो अर्जी दे दें उनकी रकम उनके खातों में भेज दी जाएगी। लेकिन सबसे पहले सेटबैक के नाम जो तोड़फोड़ शुरू की जानी है वो शुरू कर दें अन्यथा ज्यादा दिक्कत हो जाएगी। खून पसीने की कमाई से बनाए गए भवनों को तोड़ना आवंटियों के लिए किसी दर्द से कम नहीं। लेकिन फिलहाल इसके अलावा कोई चारा भी नजर नहीं आ रहा है।

चार दीवारी गिराई जा रही रंगोली की

आवास विकास की सेटबैक नोटिसों की कार्रवाई के नाम पर जिस रंगोली मंडप की तोड़फोड़ की बात कही जा रही है दरअसल उसकी केवल चारदीवारियां ही गिरायी जा रही हैं। इस मंडप की यदि बात करें तो इसमें पक्का निर्माण कोई खास नहीं है। लोहे के स्ट्रक्चर पर छतों के नाम पर टीन शेड नजर आ रहे हैं। हां चारदीवारियां जरूर सजावटी यानि डेकोरेटेड हैं जिन्हें गिराया जा रहा है। रंगोली मंडप के अलावा डा. अशोक गर्ग ने भी सेटबैक के नाम पर तोड़फोड़ शुरू करा दी है। इनके अलावा भी तीन चार और सील पड़े भवनों में भवन स्वामियों तो तोड़फोड़ शुरू कर दी है।

दायर होगी पीआईएल

शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट को राहत दिलाने को सुप्रीमकोर्ट में दायर किए जाने के लिए पीआईएल तैयार है। जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल मार्केट के भूखंड संख्या 661/6 पर कथित अवैध रूप से बनाए गए कांप्लैक्स को तोड़ने का आदेश दिया। बाकी 44 दुकानों का नाम उस आदेश में नहीं था। वो बताते हैं कि कानून कहता है कि एक केस का फैसला दूसरे केस पर अपने आप लागू नहीं होता। दूसरी बड़ी वजह अनुच्छेद 1- भेदभाव। सुप्रीमकोर्ट का यह अगर आदेश पूरे देश पर है तो सिर्फ शास्त्री नगर क्यों?। यूं तो पूरे मेरठ में 90 फीसदी निर्माण अवैध हैं। इतना ही नहीं कई सरकरी इमारत बगैर मानचित्र पास कराए बना ली गयी हैं। और तो और नई सड़क पर नगर निगम ने जब कथित विवादित भूमि पर निर्माण शुरू कराया और वहां लाखों करोड़ खर्च भी कर डाला तब तक उस बिल्डिंग का मानचित्र स्वीकृत नहीं कराया गया था। इसी के चलते ही आवास विकास ने नोटिस भी दिया था, लेकिन बिल्डिंग सरकारी है, इसलिए सरकार कभी अपने अफसरों की गलती पर कार्रवाई नहीं करती बल्कि उन्हें बचाती है या बचने का पूरा मौका देती है। । जैसा नई सड़क पर नगर निगम की बिल्डिंग मेंं देखने को मिला। कोर्ट भेदभाव बर्दाश्त नहीं करता। PIL इसी लिए डाली जाती है।

ठोस वजह है उम्मीदों की

शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट वालों को तत्काल राहत के लिए जो विकल्प सुझाए जा रहे हैं उनमें पहला पीआईएल दायर कर पहली राहत तत्काल स्टे की प्रार्थना है। इससे कम से इतना तो होगा कि आवास विकास के अफसरों ने सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के नाम पर ध्वस्तीकरण की जो तलवार लटका कर दहशत का माहौल कायम कर दिया है उससे तो राहत मिलेगी। जब तक सुनवाई चलेगी केस चलेगा तब तक कम से कम यह उम्मीद कायम रहेगी कि टूटेगा नहीं। सुनवाई के दौरान सभी 44 दुकानदार को अपना पक्ष रखने का मौका मिल जाएगा। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण जो न्याया का नर्सैगिक और प्राकृतिक नियम है वो यह कि उजाड़ने से पहले पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। जिनको तोड़ने की बात अफसर कर रहे हैं वो दो चार दिनों या रातों रात नहीं बना दी गयी हैं। चालिस साल से उनका वजूद कायम है। इसके अलावा न्याय की परिभाषा की सभी के लिए समान रूप से लागू किया जाए। कार्रवाई होगी तो केवल शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट में नहीं पूरे महानगर, प्रदेश और फिर देश में होगी यहां तक कि फिर तो जो सरकारी भवन कायदे कानून ताक पर रखकर बना दिए गए हैं, जेसीबी लगाकर उन्हें भी जमींदोज कर दिया जाए। आदेश पूरे प्रदेश में लागू करवाओ या किसी पर मत करो। सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर ध्वस्तीकरण की बात करने वाले अफसर यह ना भूलें कि साल 1982 में जब भूखंड आवंटित किए गए थे तब उस वक्त उनके बॉयलॉज में कहीं भी सेटबेक की बात का उल्लेख नहीं था। आवास विकास अफसर अपनी भूल की सजा आवंटियों काे ना दें। यह बात सुप्रीमकोर्ट को बेहतर तरीके से समझायी जा सकती है।

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