पवित्र मक्का पर हमले से हुतियों का इंकार

Shekhar Sharma
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ईरानी ने इस्लामी पवित्र स्थलों पर हमले की निंदा की, लेकिन यह भी कहा कि सिर्फ ड्रोन इंटरसेप्ट होने के दावे से किसी खास पक्ष पर सीधा आरोप साबित नहीं, यूएस से दूर चीन के करीब साऊदी अरब

नई दिल्ली। हूतियों ने पवित्र मक्का पर हमले की बात से साफ इंकार किया है। हूती सैन्य प्रवक्ता याहया सारी (Yahya Saree) ने मक्का पर हमले के आरोप को खारिज किया है। उनका कहना है कि निशाने पर सैन्य बेस और तेल सुविधाएँ थीं, पवित्र स्थल नहीं। वहीं दूसरी ओर ईरानी विदेश मंत्रालय ने इस्लामी पवित्र स्थलों पर हमले की निंदा की, लेकिन यह भी कहा कि सिर्फ ड्रोन इंटरसेप्ट होने के दावे से किसी खास पक्ष पर सीधा आरोप साबित नहीं होता। हालांकि हूती विद्रोहियों ने यमन में सऊदी अरब का F-15 लड़ाकू विमान गिराने का दावा करते हुए वीडियो जारी किया है। साऊदी अरब ने मक्का को ‘रेड लाइन’ घोषित किया गया। जुलाई 2017 के बाद यह मक्का को निशाना बनाने का दूसरा प्रयास बताया गया। जेद्दा, ताइफ, यानबू, आभा और जाजान में अलर्ट जारी। यमन के हूती विद्रोही गुट को ईरान का समर्थन प्राप्त है, न कि अमेरिका या डोनाल्ड ट्रंप का। अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही तनाव (तथा सैन्य टकराव) चल रहा है।

हूतियों की अमेरिका से सीक्रेट डील

ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिकी अधिकारियों और हूती नेताओं के बीच एक गुप्त समझौता (Secret Deal) हुआ है। इस डील के तहत हूतियों ने भरोसा दिया है कि वे लाल सागर (Red Sea) में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। इसके बदले ट्रंप प्रशासन ने यमन में हूतियों के खिलाफ सीधे हवाई हमले (Airstrikes) न करने का फैसला किया है। अमेरिकी सेना पहले से ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास ईरान के साथ एक बड़े और खर्चीले सैन्य टकराव में उलझी हुई है। अमेरिका यमन में हूतियों के खिलाफ दूसरा मोर्चा खोलकर अपने सैन्य संसाधनों को और ज्यादा बिखेरना नहीं चाहता।

अमेरिका से दूर प्रिंस सलमान

सऊदी अरब अब अमेरिका से सीधे सैन्य मदद न मिलने के बाद सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय देशों (जैसे मिस्र, तुर्की, पाकिस्तान) और चीन की तरफ भी रुख कर रहा है ताकि राजनयिक स्तर पर इस संकट का समाधान निकाला जा सके।

यह बोले ट्रंप

मक्का के पास ड्रोन मार गिराए जाने की घटना के बाद, डोनाल्ड ट्रंप ने मीडिया को बताया कि हूतियों ने खुद उनकी सरकार (प्रशासन) से संपर्क किया था और कहा था कि ‘वे अमेरिका से लड़ना नहीं चाहते’। हालांकि दुनिया अब डोनाल्ड ट्रंप को गंभीरता से नहीं लेती है। ट्रंप ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से भी बात की और भरोसा जताया कि क्षेत्र में स्थिति जल्द ही ठीक हो जाएगी। रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब ने हाल ही में अमेरिका से हूतियों के खिलाफ सैन्य मदद और हवाई हमलों (Airstrikes) की मांग की थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब की इस मांग को खारिज कर दिया और यमन के एक और युद्ध में सीधे कूदने से इनकार कर दिया।

इतिहास के सबसे प्रमुख हमले

वर्ष (ईस्वी)हमलावर / घटनाहमले का विवरण और परिणाम
1979जुहैमान अल-उतैबी (मक्का मस्जिद की घेराबंदी)आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा हमला। जुहैमान नाम के एक सऊदी कट्टरपंथी ने अपने 600 बंदूकधारियों के साथ मस्जिद अल-हरम पर कब्जा कर लिया और हजारों हाजियों को बंधक बना लिया। काबा के भीतर दो सप्ताह तक भारी गोलाबारी चली। बाद में फ्रांसीसी कमांडोज और पाकिस्तानी सेना की मदद से जहरीली गैस छोड़कर आतंकियों को बाहर निकाला गया। इस अभियान में सैकड़ों लोग मारे गए थे।
930करमातियन (Qarmatians) (मक्का की लूटपाट)बहरीन के एक शिया संप्रदाय ‘करमातियन’ के शासक अबू ताहिर अल-जन्नाबी ने मक्का पर बेहद क्रूर हमला किया था। उन्होंने हजारों हजयात्रियों का कत्ल कर उनकी लाशों को पवित्र जमजम के कुएं में फेंक दिया था। वे काबा के पवित्र ‘हज्रे अस्वद’ (काला पत्थर) को उखाड़कर अपने साथ बहरीन ले गए थे, जो करीब 20 साल बाद वापस लौटाया गया।
692हज्जाज बिन यूसुफ (उमय्यद घेराबंदी)उमय्यद राजवंश के जनरल हज्जाज बिन यूसुफ ने मक्का पर नियंत्रण पाने के लिए मक्का की पहाड़ियों से काबा पर पत्थरों और आग के गोलों (Minjanik/Catapult) से हमला किया था, जिससे काबा की इमारत को भारी नुकसान पहुंचा था और उसमें आग लग गई थी।
683हुसैन इब्न नुमैर (पहला उमय्यद हमला)मक्का के गवर्नर अब्दुल्ला इब्न अल-जुबैर के खिलाफ उमय्यद सेना ने मक्का की घेराबंदी की थी। इस दौरान भी काबा पर भारी गोलाबारी हुई थी और पवित्र कपड़े (किस्वा) सहित काबा की इमारत जल गई थी।

इसके अलावा, 2017 और हाल ही में सितंबर 2026 में यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा मक्का की ओर मिसाइल और ड्रोन दागने के प्रयास किए गए हैं, जिन्हें सऊदी वायु सेना ने हवा में ही नष्ट कर दिया।

20 नवंबर 1979 की सुबह मक्का की मस्जिद अल-हरम (Grand Mosque) पर हुआ हमला आधुनिक इतिहास की सबसे दुस्साहसिक और हिंसक घटनाओं में से एक था। जुहैमान अल उतेवी नाम के एक साऊदी कट्टरपंथी ने अपने पांच सौ लड़ाकों को लेकर इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल पर कब्जा कर लिया था। इस बेहद सुरक्षित और पवित्र जगह के भीतर हथियार पहुंचाने के लिए एक बेहद शातिर और खौफनाक रणनीति अपनाई थी। उन्होंने ताबूतों का यूज किया था। मक्का की मस्जिद अल-हरम में यह एक पुरानी परंपरा है कि जब किसी मुस्लिम की मौत होती है, तो उसके शव को नमाज-ए-जनाजा (अंतिम प्रार्थना) के लिए काबा के भीतर लाया जाता है। जुहैमान और उसके साथियों ने इसी परंपरा का फायदा उठाया। वे ट्रकों में लकड़ी के कई ताबूत भरकर लाए और सुरक्षाकर्मियों को बताया कि इनमें शव हैं। वास्तव में, उन ताबूतों के भीतर हथियार, स्वचालित राइफलें, पिस्तौल और भारी मात्रा में गोला-बारूद छिपे हुए थे। हमले से कई दिन पहले ही, इस गुट के कुछ सदस्यों ने (जो मक्का मस्जिद के विस्तार कार्य में लगे बिन लादेन कंस्ट्रक्शन ग्रुप के मजदूर थे) मस्जिद के नीचे बने विशाल भूमिगत तहखानों (Underground Vaults और Catacombs) में ट्रकों के जरिए भारी मात्रा में खाद्य सामग्री, खजूर, पानी और गैस मास्क पहुंचा दिए थे, ताकि वे लंबे समय तक अंदर टिक सकें। सुबह की नमाज (फज्र) के वक्त जब हजारों लोग मस्जिद में आ रहे थे, तब कई आतंकवादी अपने पारंपरिक ढीले सऊदी कपड़ों (Thoub) के नीचे खंजर, पिस्तौल और चेन छिपाकर भी अंदर घुस गए।

हमला कैसे शुरू हुआ?

जैसे ही सुबह की नमाज खत्म हुई, आतंकवादियों ने ताबूतों को खोलकर अपने हथियार निकाल लिए। उन्होंने तुरंत मस्जिद के सभी द्वारों (Exits) को बंद कर दिया और वहां तैनात निहत्थे पहरेदारों को मार डाला। लाउडस्पीकर पर कब्जा करके जुहैमान ने घोषणा की कि उसका साला मोहम्मद अल-कहतानी ही ‘इमाम महदी’ (इस्लामी मसीहा) है और सभी को उसकी बैत (वफादारी की कसम) लेनी होगी। उस समय मस्जिद के भीतर करीब 50,000 से अधिक हाजी मौजूद थे, जिन्हें बंधक बना लिया गया।

ऐसे हुआ संकट खत्म

यह घेराबंदी पूरे दो सप्ताह (14 दिन) तक चली। काबा के भीतर खून-खराबा प्रतिबंधित होने के कारण सऊदी सरकार को पहले देश के बड़े मौलवियों (उलेमा) से सैन्य कार्रवाई के लिए फतवा लेना पड़ा। सऊदी सेना जब सीधे तौर पर आतंकियों को बाहर निकालने में नाकाम रही, तो फ्रांस की विशेष आतंकवाद-रोधी इकाई (GIGN) के 3 कमांडों को गुप्त रूप से मदद के लिए बुलाया गया (चूंकि मक्का में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है, इसलिए एक विशेष व्यवस्था के तहत उन्हें सहयोग करने की अनुमति दी गई)। सऊदी सेना ने फ्रांस द्वारा दी गई ‘क्लोरॉपिक्रिन’ (Chloropicrin) नामक जहरीली और दम घोंटने वाली गैस को मस्जिद के भूमिगत तहखानों में पंप किया। इस गैस के कारण आतंकियों का दम घुटने लगा और वे आत्मसमर्पण करने पर मजबूर हो गए। इस पूरी खूनी जंग में आधिकारिक तौर पर 250 से अधिक लोग मारे गए (हालांकि स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार यह संख्या हजारों में थी)। जनवरी 1980 में जुहैमान और उसके बचे हुए 62 साथियों को सऊदी अरब के अलग-अलग शहरों में सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई।


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