डोनाल्ड ट्रंप के तेवर पड़े ढ़ीले, लेकिन खोखली अकड़ी कायम, बामुश्किल बातचीत को राजी हुआ ईरान, पाकिस्तान लगातार बनाए हुए है संपर्क
नई दिल्ली। सीफ फायद की मियाद बुघवार की रात 12 बजे खत्म हो जाएगी। ईरान ने अमेरिका से किसी प्रकार की बातचीत से साफ मना कर दिया है। ईरान के इस रवैये की वजह अमेरिका नेवी के द्वारा उसके बंदरगाहों की नॉकाबंदी है। वहीं दूसरी ओर ईरान के बातचीत से इंकार करने के बाद डोनाल्ड ट्रक के खिलाफ उनके अपने देश में तमाम नेशनल मीडिया आलोचनाओं से भरे हुए हैं। ट्रंप को अपने देश में विपरीत हालात का सामना करना पड़ रहा है। ट्रंप जानते हैंं कि यदि ईरान को बातचीत के लिए नहीं मनाया गया तो उनकी कुर्सी हाथ से जाती रहगी। माना जा रहा है कि इसी के चलते अमेरिका बार-बार पाकिस्तान को ईरान को मनाने के लिए दबाव डाल रहा हे। हालांकि काफी हद तक पाकिस्तान द्वारा ईरान को मना लिए जाने की भी बात कही गयी है। वैसे यदि बातचीत होती है तो उसकी पर्दे के पीछे की शर्त ईरानी बदरगाहों की नाॅकाबंदी का खत्म किया जाना होगा। इस बीच वहीं ईरानी संसद के अध्यक्ष और ईरान की वार्ता टीम के प्रमुख मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाता है, तो होर्मुज़ स्ट्रेट में यातायात सीमित रहेगा। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने तेहरान में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “अमेरिका ने युद्धविराम की शुरुआत से ही उसका उल्लंघन किया।” इस्माइल बक़ाई ने चेतावनी दी, “ईरान कोई समयसीमा या अल्टीमेटम स्वीकार नहीं करेगा और अगर अमेरिका या इसराइल कोई क़दम उठाते हैं तो ईरान ताक़तवर जवाब देगा.”
डोनाल्ड ट्रंप को नसीहत
बातचीत के लिए तल्खी के बीच पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रज़ा अमीरी मुक़द्दम का बयान आया है। रज़ा अमीरी मुक़द्दम ने एक्स पर लिखा है, “यह बात सब जानते हैं कि जिस के पास बड़ी सभ्यता है, वह धमकी से डरकर और दबाव में बातचीत नहीं करेगा. यह एक अहम इस्लामी और धार्मिक सिद्धांत है. काश अमेरिका इसे समझ पाता।”
ऐसे हालातों में होगी भी तो क्या बात
जिन हालातों में इस बातचीत की बात कही जा रही है वो बातचीत यदि हो भी गयी तो उसमें निकलेगा क्या। दोनों ही मुल्कों के बीच इस कदम तल्खी पैदा हो गयी है कि बातचीत केवल रस्म अदायगी भर है। दरअसल इस बात चीत को अब केवल डोनाल्ड ट्रंप के लिए अपनी नाक बचाने से ज्यादा नहीं माना जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप जानते हैं कि यदि ईरान बातचीत के लिए नहीं माना तो उन्हें अपने देश में अपार मुश्किलों का सामना करना होगा।
सारी फसाद की जड़ नाकाबंदी
इस सारे फसद की ईरानी बंदरगाहों की नाकबंदी किया जाना है। नॉटो और यूरोपियन देशों के अलावा अब दुनिया के तमाम देश मान रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप को ना तो बातचीत से कुछ लेना है ना ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम से कुछ लेना है, क्योंकि परमाणु कार्यक्रम जैसी कोई बात है ही नहीं यह बात खुद ट्रंप प्रशासन के खुफिया प्रमुख तुलसी गैवार्ड भी कह चुके हैं। दरअसल डोनाल्ड ट्रंप इस मुसीबत से इज्जत से निकल जाने का रास्ता भर तलाश रहे हैं।


