उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति बेहतर होगा बरतें संयम

Shekhar Sharma
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शिक्षक संघ मदरिस अरबिया द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के विरुद्ध दायर मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन का आदेश प्रकरण

नई दिल्ली। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार का मानना है कि उच्च संवैधानिक पदों पर जो आसनी है उन्हें किसी भी विषय पर टिप्पणी में संयम बरतना चाहिए। और मामले को समग्र समाज के नजरिये में देखना चाहिए। दरअसल विहिप के अध्यक्ष की यह प्रतिक्रिया इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन द्वारा मदरसा मामले में की गई टिप्पणी के बाद आयी है, जिसमें उन्होंने संस्थागत संतुलन बनाए रखने के लिए न्यायिक संयम आवश्यक की बात कही है।

यह है पूरा मामला

शिक्षक संघ मदरिस अरबिया द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के विरुद्ध दायर मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन द्वारा 27 अप्रैल के आदेश पर विहिप अध्यक्ष को हैरानी हुई है। उच्च न्यायालय के समक्ष एनएचआरसी द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) के महानिदेशक को मदरसों में वित्तीय कुप्रबंधन सहित आरोपों की जांच करने और कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) दाखिल करने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता के वकील ने सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया क्योंकि बहस करने वाले वकील उपलब्ध नहीं थे। एनएचआरसी की ओर से कोई उपस्थित नहीं था क्योंकि यह एक नया मामला था और एनएचआरसी को कोई नोटिस नहीं भेजा गया था। सुनवाई स्थगित कर दी गई।
हालांकि, न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने पक्षकारों के अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति में और बिना किसी तर्क के प्रथम दृष्टया यह राय व्यक्त की कि यह आदेश एनएचआरसी के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। जो भी हो।

एनएचआरसी पर जमकर हमला क्यों

विहिप अघ्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार ने कहा है कि न्यायाधीश ने एनएचआरसी पर जमकर हमला बोला। न्यायाधीश ने आरोप लगाया कि एनएचआरसी ने कभी भी ऐसे मामलों का संज्ञान नहीं लिया है जिनमें मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर हमले किए गए हों और कुछ मामलों में उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी गई हो… न्यायालय को इस बात की जानकारी नहीं है कि एनएचआरसी ने कभी भी ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लिया हो जहां गुंडे कानून को अपने हाथ में लेकर देश के आम नागरिकों को परेशान करते हैं… न्यायाधीश की टिप्पणियां इतनी अनुचित थीं कि पीठ के दूसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक सरन ने असहमति व्यक्त की। उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि वे “भाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन द्वारा दिए गए आदेश से असहमत हैं”।

विहिप अध्यक्ष स्पष्ट कहते है कि वो मानते हैं कि किसी भी व्यक्ति की, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, लिंचिंग निंदनीय, गैरकानूनी और दंडनीय है। अपराध करने वालों को, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, उसके परिणामों का सामना करना चाहिए। अपराधी किसी धर्म के नहीं होते और उनके कृत्य समग्र रूप से नागरिक समाज के विरुद्ध हैं।

संयम बरतने की विशेष आवश्यकता

इसलिए, इस मामले में यह कहना अनुचित है कि ऐसी घटनाएँ किसी विशेष धर्म के अनुयायियों के विरुद्ध हो रही हैं। ये टिप्पणियाँ तथ्यात्मक रूप से गलत हैं और भारत के प्रमुख समुदायों के बीच असामंजस्य पैदा कर सकती हैं। उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से संयम बरतने की विशेष आवश्यकता है।



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