मनी ट्रांसफर पर चुप्पी संदिग्ध जांच की दरकार

Shekhar Sharma
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75 लाख के बाद अब 48 लाख के ट्रांसफर का नया मामला, 6 खातों में उच्च-मूल्य लेन-देन से उठे सवाल

मेरठ। छावनी परिषद के कुछ कर्मचारियों के खातों में लाखों की रकम भेजे जाने के मामले में ऑफिस के उच्च पदस्थ अफसर की चुप्पी संदिग्ध है। इस मामले में केंद्र सरकार विशेषकर रक्षामंत्री से जांच की दरकार है। ताजा मामला 48 लाख की बड़े रकम के ट्रांसफर का है। इससे पहले ठीक इसी तर्ज पर कुछ आउटसोर्स कर्मचारियों के खातों में 75 लाख की रकम को भेजे जाने का था। 75 लाख की रकम पर इससे पहले कोई सफाई आती नया मामला आउटसोर्स के कुछ कर्मचारियों के खातों मे 48 लाख भेजे जाने का सामने आया है।

छावनी परिषद रक्षा मंत्रालय के आधीन आता है। इसके तमाम उच्च पदस्थ अफसरों की जवाबदेही रक्षामंत्रालय के प्रति है। और बोर्ड भंग होने के बाद छावनी परिषद के कामों की ज्यादातर गतिविधियां भी मेरठ कैंट के सैन्य इलाकों तक अधिक नजर आती हैं। नागरिक इलाकों में उतनी सक्रियता नजर नहीं आती है जितनी की निर्वाचित बोर्ड के कार्यकाल के दौरान आती है। यह बात इसलिए उल्लेख की जा रही है कि आउटसोर्स कर्मचारियों की ड्यूटी आमतौर पर सैन्य इलाकों में भी लगायी जाती है। ऐसे में कुछ आउटसोर्स कर्मचारियों के खातों में एकाएक बड़ी रकम का आना जवाब की उम्मीद में सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए। ताजा मामला उपलब्ध ट्रांसफर शीटों से एक और वित्तीय लेन-देन सामने आया है। दस्तावेजों के अनुसार 6 खातों में लगभग 48 लाख रुपये की राशि ट्रांसफर प्रदर्शित है, जिससे लेन-देन की प्रकृति को लेकर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं।

इनके खातों में भेजी गयी है रकम

जिस रकम को भेजे जाने की बात सामने आयी है वो रकम उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार लाभार्थियों में ललित कुमार, विनीत कुमार, रमेश सिंह, कपिल कुमार, रश्मि तथा दीपक कोरी के नाम शामिल हैं। ट्रांसफर शीट में ₹40,000 से ₹48,000 तक की अनेक प्रविष्टियां दर्ज हैं, जिनका कुल योग लगभग ₹48 लाख बताया जा रहा है। विशेष बात यह है कि इससे पूर्व सामने आई ट्रांसफर शीटों में भी आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के खातों में बड़ी राशि जमा होने का मामला प्रकाश में आया था। दोनों प्रकरणों में प्रयुक्त बैंक खातों, लाभार्थियों तथा भुगतान स्रोतों की समानताओं को देखते हुए स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है।

ठेकेदार की कंपनियों के नाम की चर्चा

उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यह भी कहा जा रहा है कि संबंधित लेन-देन का संबंध श्रीराम कंस्ट्रक्शन तथा एम.एस. अग्रवाल एंड कम्पनी से हो सकता है। इस संबंध में पूर्व में कंपनी पक्ष की ओर से कुछ भुगतानों को कर्मचारियों को दिए गए ऋण (Loan) के रूप में बताया गया था। हालांकि इस दावे का स्वतंत्र सत्यापन होना अभी शेष है।

कौन देगा इन सवालों का जवाब

यह मामला सामने आने के बाद जो सवाल सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं उनका जवाब कौन देगा। पहला यह कि इन ट्रांसफरों के पीछे छिपा मकसद क्या हो सकता है। क्या ये भुगतान वेतन, ऋण, अग्रिम अथवा किसी अन्य मद में किए गए, समान अथवा संबंधित लाभार्थियों के खातों में बार-बार बड़ी राशि भेजे जाने का आधार क्या था, जो रकम आउटसोर्स कर्मचारियों के खाते में भेजी गई है उसको भेजे जाने व उसके उपयोग के पीछे भेजने वाले की क्या मंशा हो सकती है। और सबसे बड़ा और वास्तविक सवाल यह है कि इन लेन-देन का वास्तविक लाभार्थी (Ultimate Beneficiary) कौन था। ये वो सवाल है जिनका उत्तर केवल केंद्र की सीबीआई या फिर ईडी सरीखी किसी ऐजेंसी की जांच के बाद ही सही सही मिल सकता है। वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियों से मांग की गई है कि वे दोनों मामलों का संयुक्त परीक्षण करते हुए Transaction Trail, Fund Flow, KYC Records, Beneficial Ownership, Withdrawal Pattern तथा संबंधित संविदात्मक अभिलेखों की जांच करें।

यह भी साफ कर देते हैं

यह रिपोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों एवं सार्वजनिक रूप से सामने आए तथ्यों के आधार पर तैयार की गई है। किसी व्यक्ति, कंपनी, ठेकेदार या अधिकारी के विरुद्ध कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा रहा है। वास्तविक स्थिति सक्षम जांच एजेंसियों की जांच एवं निष्कर्षों के बाद ही स्पष्ट होगी।

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