डोर टू डोर घोटाले में कौन सी बात को माना जाए सही, या फिर पीएमओ को भेजी गयी सूचना पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल
मेरठ। कैंट बोर्ड के अफसरों के भ्रष्टाचार का चलता फिरता मुजसमा साबित हो रहा करोड़ों रुपए का डोर टू डोर घोटाले को लेकर पीएमओ को जो जानकारी सीईओ के हवाले से भेजी गयी है उसको लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। जैसा सुनने में आ रहा है यदि वो वाकई सही है तो मामला बेहद गंभीर है। क्योंकि दो बातें एक साथ नहीं हो सकतीं। ये दो बातें कैसे परस्पर विरोधी हो रही हैं यह भी आगे स्पष्ट कर देते हैं।
मामला बंद हो गया या जांच लंबित है
करोड़ों के घपले घोटाले का बताए जा रहे डोर टू डोर ठेके में जो जांच चल रही है वो पूरी होकर बंद हो गयी है या लंबित है। ऐसा पूछे जाने के पीछे पर्याप्त आधार हैं। दरअसल में CEO के CPGRAMS उत्तर में स्वयं इसे “जाने-अनजाने में हुई गलती” बताया गया। इसके बावजूद संबंधित वैधानिक अपील आज तक लंबित है, लेकिन आरटीआई और प्रधानमंत्री पोर्टल पर लगातार “जांच पूर्ण” और “मामला बंद” बताया जा रहा है। सही बात कौन सी है पीएमओ के पोर्टल को भेजी गई जानकारी या फिर जो उत्तरी आरटीआई के जवाब में दिया गया है वो। निश्चित रूप से एक मिथ्या है यह बात तय है।
परस्पर विरोधी सूचनाएं क्यों
डोर टू डोर घोटाले को लेकर जिन परस्पर विरोधी सूचनाओं का यहां जिक्र किया जा रहा है उसके पीछे की वजह क्या है। खुद को बचाना या जो फंसे हुए हैं उन्हें बचाया या फिर क्यों ना यह पूछ लिया जाए कि डोर टू डोर ठेकेदार से ये रिश्ता क्या कहलाता है। आगरा में ऐसा क्या खास मेहमाननवाजी हो गयी कि उसके लिए परस्पर विरोधी सूचनाएं तक अपलोड तक करने में गुरेज नहीं बरती जा रही है।
“डोर-टू-डोर ठेके” मामले में नया मोड़
अब इन्हीं सारी कारगुजारियों की वजह से एक ही दिन की दो CBI सिफारिशों पर मेरठ छावनी परिषद के दोहरे मापदंड पर भी उठे सवाल रहे हैं। करोड़ों रुपये के डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण ठेके में पहले से विवादों में घिरी मेरठ छावनी परिषद पर अब चयनात्मक अनुशासनिक कार्रवाई और विरोधाभासी प्रशासनिक रवैये के नए आरोप लग रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यही क्या जो सवाल उठ रहे हैं उनका उत्तर भी मिलगा या सवाल सिर्फ फाइलाें में कैद होकर रह जाएंगे। जानकारों की मानें तो सीबीआई/एसीबी गाज़ियाबाद की 23 जनवरी 2024 की दो अलग-अलग सिफारिशों पर परिषद ने कथित रूप से दो अलग-अलग मापदंड अपनाए। डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण मामले में सफाई निरीक्षक अभिषेक गंगवार एवं सफाई अधीक्षक वी.के. त्यागी को “बैक-डेटेड वर्क ऑर्डर” मामले में लघु दंड दिया गया। जबकि CEO के CPGRAMS उत्तर में स्वयं इसे “जाने-अनजाने में हुई गलती” बताया गया। इसके बावजूद संबंधित वैधानिक अपील आज तक लंबित है, लेकिन आरटीआई और प्रधानमंत्री पोर्टल पर लगातार “जांच पूर्ण” और “मामला बंद” बताया जा रहा है।
निंदा प्रविष्टि में क्यों
दूसरी ओर, उसी दिन की दूसरी सीबीआई सिफारिश वाले अवैध निर्माण/अतिक्रमण मामले में, ध्वस्तीकरण, लिखित आश्वासन और जुर्माना जमा होने के बावजूद दोबारा कथित अवैध निर्माण हो जाने पर भी संबंधित जूनियर इंजीनियर की सजा को दो महिने में ही घटाकर “निंदा प्रविष्टि” में बदल दिया गया। सबसे बड़ा विरोधाभास यह बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री पोर्टल पर परिषद ने अतिक्रमण मामले को “सीबीआई न्यायालय में विचाराधीन” बताकर कार्रवाई से असमर्थता जताई, जबकि उसी मामले में दंड को कम करने में कोई बाधा नहीं दिखाई दी।
आखिर मजबूरी क्या
जब मामला अभी वैधानिक अपील के तहत लंबित है तो उसको बंद किया क्याें बताया जा रहा है। क्या यह मिथ्या जानकारी देने की श्रेणी में नहीं आएगा। क्या यह विभागीय स्तर पर संज्ञेय अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। एक ओर तो जब परिषद स्वयं एक मामले में “जाने-अनजाने” की गलती मान रही है, तो वैधानिक अपील लंबित रहते हुए “मामला बंद” क्यों बताया जा रहा है? यदि अतिक्रमण मामला वास्तव में विचाराधीन था, तो दंड में ढील कैसे दी गई? एक ही दिन की दो सीबीआई सिफारिशों पर दो अलग-अलग मापदंड क्यों अपनाए गए?
आरोप है कि परिषद ने एक मामले में सीबीआई सिफारिश को “पत्थर की लकीर” मान लिया, जबकि दूसरे मामले में उसी सिफारिश को “रबर की लकीर” की तरह बदल दिया। मामले ने अब प्रशासनिक निष्पक्षता, अनुशासनिक पारदर्शिता और रक्षा भूमि संरक्षण पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।


