पूरा शहर ही अब तोड़फोड़ के मुहाने पर

Shekhar Sharma
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शास्त्रीनगर नहीं पूरा शहर ध्वस्तीकरण के मुहाने पर, अवैध है तो हटेगा— ईडब्लूएस को भी नहीं राहत, 44 सील भवनों पर ध्वस्तीकरण

मेरठ। केवल शास्त्रीनगर ही नहीं पूरे शहर के अवैध निर्माणों को ध्वस्तीकरण के मुहाने पर आ गए हैं। शास्त्रीनगर के ८१५ भवनों के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने अफसरों को जमकर फटकारा। एक नर्सिंगहोम मामले में सीएमओ को तलब कर लिया। कोर्ट ने आवास विकास परिषद से पूछा कि कार्रवाई केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित क्यों है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरे शहर में जहां-जहां अवैध निर्माण हैं, उनकी पहचान कर समान रूप से कार्रवाई की जाए। अधिकारीे आंखें बंद ना रखें। कोर्ट ने सावधान किया कि अवैध निर्माण चिन्हित करने में भेदभाव के आरोप नहीं लगने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि पूरे शहर में व्यापक निरीक्षण किया जाए। सभी अवैध निर्माणों की पहचान कर कार्रवाई जारी रखी जाए। सेटबैक में हुए सभी अतिक्रमण हटाए जाएं। अगली सुनवाई तक नई प्रगति रिपोर्ट अदालत में दाखिल की जाए। कोर्ट ने दो टूक कहा कि मकान हो या फिर पैथ लैब, अस्पताल या स्कूल अवैध निर्माण मामले में किसी को कोई राहत नहीं दी जाएगी। यदि नियमों के विरुद्ध अनुमति देने में अधिकारियों की भूमिका पाई गई तो उन्हें भी जवाबदेही तय की जाएगी। अगली सुनवाई सितंबर में होगी।

विपुल सिंहल बोले कुछ तो करो सरकार

मेरठ। शहर के बड़े व्यापारी नेता सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का सम्मान करना हम सभी का दायित्व है। लेकिन आवास विकास क्षेत्र के 44 व्यावसायिक भूखंडों तथा ईडब्ल्यूएस मकानों पर होने वाली कार्रवाई से सैकड़ों छोटे व्यापारियों और गरीब परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी। बिना वैकल्पिक व्यवस्था के ध्वस्तीकरण से अनेक परिवार आर्थिक संकट में आ जाएंगे। हम सरकार एवं आवास विकास परिषद से आग्रह करते हैं कि न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए पहले प्रभावित लोगों के पुनर्वास और वैकल्पिक व्यापारिक स्थल की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। वर्षों तक नियमों के उल्लंघन पर रोक न लगाने की जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों पर नहीं डाली जा सकती। यदि इसी प्रकार कार्रवाई होती रही तो मेरठ में बड़ी संख्या में निर्माण ध्वस्तीकरण के दायरे में आ सकते हैं। सरकार को एक व्यावहारिक नीति बनाकर जहां संभव हो, पुराने निर्माणों को नियमानुसार नियमित (रेगुलराइज) करने पर विचार करना चाहिए तथा भविष्य में नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही, जिन अधिकारियों के कार्यकाल में ऐसे निर्माण हुए, उनकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

कोर्ट का कड़ा रूख

सुप्रीम कोर्ट ने आज की हियरिंग में बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘जो भी अनधिकृत है, उसे कंपाउंड नहीं किया जा सकता। उसे हटाना ही होगा।Ó कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ईओडब्लूएस के मकानों को भी केवल इस आधार पर कोई विशेष राहत नहीं दी जाएगी। परिषद ने अदालत से आग्रह किया कि 328 ईडब्लूएस मकानों में 1 से 3 मीटर तक के छोटे निर्माण को 1982 के नियमों के तहत कंपाउंड करने की अनुमति दी जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया।

कंपाउंडिग का कोई सवाल ही नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई निर्माण मास्टर प्लान और स्वीकृत नक्शे के अनुरूप नहीं है, तो उसके कंपाउंडिंग का सवाल ही नहीं उठता। अदालत ने दो टूक कहा कि अवैध निर्माण को किसी भी परिस्थिति में वैध नहीं बनाया जा सकता। ईओडब्लू होने का अर्थ यह नहीं कि कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार मिल जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह व्यक्तिगत मामलों में नहीं जाएगी और किसी श्रेणी के लिए अलग नियम नहीं बनाएगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि आवासीय क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर, बैंक या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां नियमों के विरुद्ध हैं। यदि कोई व्यवसाय करना चाहता है तो उसे वैध व्यावसायिक परिसर में किया जाए, न कि आवासीय भवन में।

सीएमओ को किया तलब

एक मामले में जब वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल के पास मुख्य चिकित्सा अधिकारी का प्रमाणपत्र है और वह अस्पताल नहीं बल्कि डायग्नोस्टिक सेंटर चला रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई। अदालत ने पूछा कि संबंधित सीएमओ का नाम क्या है और कहा कि उन्हें तलब किया जाएगा। डायग्नोस्टिक सेंटर चलाने की अनुमति देने का अधिकार किसने दिया, क्या डायग्नोस्टिक सेंटर व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जाएगा। एक शहर की स्थिति इतनी खराब है तो राज्य के अन्य हिस्सों का क्या हाल होगा। एक अन्य मामले में अदालत ने पाया कि मूल स्वीकृति आवासीय भवन की थी, लेकिन बाद में वहां स्कूल संचालित किया जाने लगा। अदालत ने कहा कि यदि स्कूल चलाना है तो उसे वैध संस्थागत परिसर में संचालित किया जाए।

सरकार ने हटाया तो देना होगा खर्चाअदालत ने आदेश कहा है कि यदि पूरा भवन व्यावसायिक उपयोग में बदल चुका है तो पूरे भवन को ध्वस्त किया जा सकता है। यदि केवल अतिरिक्त हिस्सा अवैध है तो 15 दिन का नोटिस दिया जाएगा। मालिक स्वयं अवैध निर्माण हटाए, अन्यथा प्राधिकरण ध्वस्तीकरण करेगा। ध्वस्तीकरण का पूरा खर्च भवन स्वामी से भू-राजस्व की तरह वसूला जाएगा।

राहत से ना

जिरह के दौरान कई पक्षों ने बायलॉज़ और स्थानीय नियमों का हवाला देकर राहत की मांग की। इसे भी सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि बायलॉज़ का सहारा लेकर लोगों की जान से समझौता नहीं किया जा सकता। मानव जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है। कोर्ट ने लखनऊ और मालवीय नगर जैसी आग की घटनाओं का जिक्र किया और कहा कि अवैध निर्माण और संकरी जगहों पर अतिक्रमण लोगों की जान के लिए गंभीर खतरा हैं। किसी प्रकार की नरमी उचित नहीं की जाएगी।

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